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40 हजार करोड़ का ट्रांजेक्शन, 40,000 से ज्यादा बीसी सखियां मैदान में — यूपी के गांवों में बैंकिंग व्यवस्था की बदली तस्वीर

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उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब गांव के लोगों को पैसे निकालने या जमा करने के लिए शहरों के बैंक शाखाओं की लंबी कतारों में खड़ा नहीं होना पड़ता। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की महत्वाकांक्षी योजना ‘वन ग्राम पंचायत–वन बीसी सखी’ मॉडल ने ग्रामीण बैंकिंग को घर-घर तक पहुंचाकर एक नई मिसाल कायम की है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में कार्यरत बीसी सखियों के माध्यम से अब तक 40,000 करोड़ रुपये से अधिक का बैंकिंग लेन-देन किया जा चुका है।

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गांवों में बैंकिंग की डिजिटल दस्तक

मई 2020 में शुरू की गई इस योजना का मकसद बैंकिंग सेवाओं को सीधे ग्रामीणों के द्वार तक पहुंचाना था। ‘बिजनेस कॉरेस्पॉन्डेंट सखी’ के रूप में काम कर रहीं महिलाएं बैंक और ग्रामीण उपभोक्ताओं के बीच सेतु बनकर उभरी हैं। इनके जरिए न सिर्फ लेन-देन आसान हुआ है, बल्कि गांवों में डिजिटल वित्तीय जागरूकता भी बढ़ी है।

प्रमुख उपलब्धियां

कुल बैंकिंग लेन-देन: 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा

कमीशन/आय: 106 करोड़ रुपये से अधिक

प्रशिक्षित महिलाएं: 50,225

सक्रिय तैनाती: करीब 40,000 बीसी सखियां

घर के पास मिल रही बैंकिंग सेवाएं

जहां पहले पेंशन निकालने, पैसा जमा करने या ट्रांसफर के लिए ग्रामीणों को शहर जाना पड़ता था, वहीं अब ये सभी सुविधाएं गांव में ही उपलब्ध हैं। बीसी सखियां निम्न सेवाएं दे रही हैं:

नकद जमा और निकासी

बैलेंस व ट्रांजेक्शन जानकारी

मनी ट्रांसफर व ऋण आवेदन

आरडी और एफडी खाते खुलवाना

महिला सशक्तिकरण की मजबूत पहल

इस योजना ने ग्रामीण महिलाओं को रोजगार और सम्मान दोनों दिया है। तकनीक से जुड़कर ये महिलाएं परिवार की आय बढ़ाने के साथ सामाजिक पहचान भी बना रही हैं। 106 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई यह दर्शाती है कि वित्तीय सेवाओं के संचालन में उनकी भागीदारी कितनी प्रभावी रही है।

हर ग्राम पंचायत तक विस्तार का लक्ष्य

प्रदेश सरकार का उद्देश्य राज्य की 57,000 से अधिक ग्राम पंचायतों में बीसी सखियों की तैनाती सुनिश्चित करना है। अब तक 50 हजार से ज्यादा महिलाओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है, जिससे स्पष्ट है कि आने वाले समय में ग्रामीण बैंकिंग नेटवर्क और व्यापक होगा।

भरोसे की नई नींव

शुरुआत में तकनीक को लेकर ग्रामीणों में झिझक थी, लेकिन बीसी सखियों ने अपने व्यवहार और सेवा से विश्वास कायम किया। आज बुजुर्ग, किसान और महिलाएं — सभी बैंकिंग जरूरतों के लिए इन्हीं पर निर्भर हैं। दरअसल, यूपी का ‘बीसी सखी’ मॉडल अब महज एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण आर्थिक सशक्तिकरण का प्रभावी माध्यम बन चुका है। 40 हजार करोड़ रुपये का लेन-देन इस बात का संकेत है कि प्रदेश के गांव डिजिटल बैंकिंग और आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

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