उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में रविवार की रात जो कुछ हुआ, उसने पूरे प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर का ध्यान खींच लिया है। “आई लव मोहम्मद” के समर्थन में निकाले गए जुलूस के दौरान पुलिस पर हुए हमले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस को न केवल पत्थरबाजी का सामना करना पड़ा, बल्कि गंगाघाट इंस्पेक्टर की वर्दी के स्टार तक नोच लिए गए। यह दृश्य बताता है कि हालात किस ओर बढ़ रहे हैं और कानून-व्यवस्था की चुनौती किस कदर गंभीर हो चुकी है।दरअसल, जैसे-जैसे 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, विपक्षी दल और मुस्लिम समुदाय के कुछ कट्टरपंथी हिस्से ज्यादा आक्रामक होते दिख रहे हैं। हालात यह हैं कि अब उन्हें पुलिस का भी खौफ नहीं रहा। जिस राज्य की पुलिस अपने कठोर रवैये और सख्त कार्यवाही के लिए जानी जाती है, उसी पुलिस पर खुलेआम हमला होना किसी सामान्य घटना के दायरे में नहीं रखा जा सकता।यह मामला केवल उन्नाव तक सीमित नहीं है।
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इस घटना ने एक बड़ा संदेश दिया है कि अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में ऐसी घटनाएं प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में देखने को मिल सकती हैं। और इसकी सबसे बड़ी आशंका है अभी – जब नवरात्रि का पर्व शुरू हो चुका है और आने वाले दिनों में मोहर्रम जैसे मौके भी आने वाले हैं। इतिहास गवाह है कि धार्मिक आयोजनों के इस दौर में सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं ज्यादा भड़कती हैं।इस पूरे घटनाक्रम के बाद सबकी निगाहें अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर टिकी हुई हैं। वजह साफ है – योगी को हमेशा “कठोर प्रशासक” और “जंगलराज पर नकेल कसने वाले” मुख्यमंत्री के रूप में देखा गया है। लेकिन उन्नाव की घटना ने उनकी छवि के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। सवाल यह है कि योगी आदित्यनाथ इस पूरी स्थिति को लेकर किस तरह का कानूनी और प्रशासनिक कदम उठाएंगे।
क्या वे परंपरागत तरीके से लाठी-डंडे और गिरफ्तारी तक सीमित रहेंगे या फिर कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कोई ठोस और मिसाल कायम करने वाला कदम उठाएंगे?यह भी समझना होगा कि यह मामला सिर्फ “जुलूस” या “पुलिस-पब्लिक टकराव” का नहीं है। यह चुनावी राजनीति से भी सीधे जुड़ता है। विपक्ष चाहता है कि माहौल गर्म हो, सत्ता असहज हो और हिंदू वोटर में बेचैनी फैले। वहीं मुस्लिम समाज का एक हिस्सा यह मान बैठा है कि जब तक वे सड़कों पर उतरकर आक्रामकता नहीं दिखाएंगे, तब तक उनकी राजनीतिक मौजूदगी नहीं मानी जाएगी। ऐसे में यह तनाव सीधे-सीधे 2027 के चुनावी समीकरणों पर असर डाल सकता है।इसलिए योगी आदित्यनाथ के सामने आज की सबसे बड़ी चुनौती यही है – कानून-व्यवस्था को हर हाल में काबू में रखना। दंगाइयों को दबाना, माहौल को बिगड़ने से रोकना और पुलिस का मनोबल टूटने न देना।
क्योंकि अगर पुलिस ही असुरक्षित महसूस करने लगे, तो आम जनता का भरोसा राज्य सरकार से उठ जाएगा।उन्नाव की यह घटना चेतावनी है कि अगर समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में सांप्रदायिक दंगे और कानून-व्यवस्था की बड़ी घटनाएं उत्तर प्रदेश को झकझोर सकती हैं। और तब 2027 का चुनाव “विकास” या “मंडल-कमंडल” से हटकर सिर्फ और सिर्फ “कानून-व्यवस्था” पर सिमट जाएगा। यह समय है कि योगी आदित्यनाथ अपनी पहचान के अनुरूप कठोर और निर्णायक फैसले लें। वरना, विपक्ष और कट्टरपंथी ताकतें इस आग को भड़काने से पीछे नहीं हटेंगी।







