उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह केवल प्रशासनिक निर्णयों या संगठनात्मक बैठकों तक सीमित नहीं है। इसके भीतर एक गहरी, लगातार चलती और अब लगभग सार्वजनिक हो चुकी सत्ता संघर्ष की रेखा साफ नज़र आने लगी है।

यह रेखा है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच का अविश्वास।ऊपर से भले ही दोनों नेता सामान्य औपचारिक व्यवहार करते दिखें, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि दोनों की कार्यशैली, सोच और सत्ता पर पकड़ को लेकर टकराव लगातार बना हुआ है। हालात यह हैं कि योगी आदित्यनाथ अपनी पसंद का डीजीपी तक उत्तर प्रदेश में नियुक्त नहीं करा पा रहे। कई अहम पदों पर फैसले सीधे केंद्र से हो रहे हैं, जिससे यह संदेश लगातार जा रहा है कि राज्य सरकार की स्वायत्तता सीमित की जा रही है।उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और केशव प्रसाद मौर्य भी वस्तुतः मुख्यमंत्री से अधिक सीधे केंद्र से संवाद करते दिखाई देते हैं।
यही नहीं, यूपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की नियुक्ति और उनका सार्वजनिक व्यवहार जिसमें उन्होंने अपने किसी भी पोस्टर में मुख्यमंत्री की तस्वीर तक नहीं लगाई यह बताने के लिए काफी है कि सत्ता का एक समानांतर ध्रुव यूपी में सक्रिय है।यदि पीछे लौटकर देखें तो यह टकराव अचानक पैदा नहीं हुआ।2017 में योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही यह असहजता शुरू हो गई थी।2022 में अमित शाह की इच्छा थी कि मनोज सिन्हा को मुख्यमंत्री बनाया जाए, लेकिन आरएसएस ने खुलकर योगी आदित्यनाथ का समर्थन किया। नतीजा यह रहा कि योगी दोबारा मुख्यमंत्री बने। 2024 के लोकसभा चुनाव में यह टकराव और स्पष्ट हो गया। अमित शाह द्वारा चुने गए कई उम्मीदवारों के प्रचार से योगी आदित्यनाथ दूरी बनाते दिखे।
नतीजा यह रहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को अपेक्षा से कम सीटें मिलीं।इसी कड़ी में अब यूपी में ठाकुर और ब्राह्मण समाज की लगातार बैठकों का दौर शुरू हो गया है। इन बैठकों का एजेंडा स्पष्ट है योगी आदित्यनाथ। यह दोनों सामाजिक वर्ग आज भी खुलकर योगी के साथ खड़े नजर आ रहे हैं, और यह संकेत दे रहे हैं कि योगी सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक सामाजिक–राजनीतिक ध्रुव बन चुके हैं। आने वाला विधानसभा चुनाव इस संघर्ष की अगली निर्णायक लड़ाई बनेगा।यह चुनाव सिर्फ सरकार बनाने का नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि यूपी की राजनीति का केंद्र लखनऊ रहेगा या दिल्ली।एक तरफ योगी का केंद्रीकृत, निर्णायक, जमीनी और हिंदुत्व आधारित मॉडल है।दूसरी तरफ दिल्ली का संगठनात्मक, नियंत्रित और मैनेजमेंट आधारित सत्ता मॉडल।उत्तर प्रदेश की राजनीति अब केवल “कौन जीतेगा” का सवाल नहीं है, बल्कि “किसका मॉडल चलेगा” का सवाल बन चुकी है।






