उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ टकराव ऐसे रहे हैं जिन्होंने सत्ता की परिभाषा ही बदल दी। साल 2002 का मायावती राजा भैया टकराव उन्हीं ऐतिहासिक मोड़ों में से एक है, जिसने यह साबित किया कि अगर सत्ता दृढ़ हो तो बाहुबल भी कानून के आगे झुक सकता है।
2002 के विधानसभा चुनावों के दौरान कुंडा के बाहुबली नेता रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया द्वारा दिया गया बयान “मायावती को सबक सिखाएंगे” लेकिन तमाम राजनीतिक जोड़-तोड़ और दबावों के बावजूद मायावती की सरकार बनी। और इसके बाद जो हुआ, उसने यूपी की राजनीति में भूचाल ला दिया। सरकार बनते ही मायावती ने राजा भैया और उनके पिता उदय प्रताप सिंह पर POTA (आतंकवाद निरोधक कानून)के तहत जेल भेजा ।
यह वही कानून था जो देश के दुर्दांत आतंकियों पर लगाया जाता था। राजा भैया के खिलाफ पुराने मामलों को फिर से खोला गया, उनके परिवार की संपत्तियाँ जब्त की गईं, और कुंडा स्थित महल पर छापे मारे गए।छापों में बड़ी संख्या में हथियार मिलने के बाद मायावती सरकार ने उन्हें “खतरनाक आतंकी गतिविधियों में संलिप्त” करार दिया। इतना ही नहीं, सरकार ने यह दावा भी किया कि खुफिया रिपोर्टों के अनुसार राजा भैया और उनके पिता पाकिस्तान से संपर्क में हो सकते हैं और गणतंत्र दिवस के दिन मायावती की हत्या की साजिश रच रहे थे।
राजा भैया के महल के अंदर बने तालाब को रिज़र्व्ड बर्ड सेंचुरी घोषित कर वन विभाग को सौंप दिया गया। मायावती के इन फैसलों पर सवाल भी उठे। विपक्ष ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया, लेकिन दलित समाज और कानून-व्यवस्था से त्रस्त जनता के बड़े हिस्से ने इसे सत्ता की दृढ़ता के रूप में देखा। मायावती की छवि एक ऐसी मुख्यमंत्री की बन गई जो न तो धमकियों से डरती है और न ही बाहुबलियों के सामने झुकती है।यहीं से मायावती की छवि “सामान्य मुख्यमंत्री” से निकलकर “लार्जर दैन लाइफ” नेता की बननी शुरू हुई। एक ऐसी नेता जो सत्ता में आकर भी समझौते नहीं करती, बल्कि संदेश देती है कि कानून सबके लिए बराबर है।


