उत्तर प्रदेश के इटावा से एक चौंका देने वाली और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। जहां एक तरफ मेरठ की घटनाओं पर सियासी दल बयानबाज़ी में जुट जाते हैं, वहीं इटावा में दलित समाज पर हुए हमले पर अब तक रहस्यमयी खामोशी छाई हुई है।मामला उसराहार थाना क्षेत्र के भौरजपुर गांव का है, जहां दलित समाज द्वारा श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया जा रहा था।
मंच पर देवी-देवताओं के साथ संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर भी श्रद्धा से लगाई गई थी। दिन में कथा और रात में कीर्तन का कार्यक्रम चल रहा था, जबकि 11 जनवरी को भंडारे का आयोजन तय था। आयोजक अखिलेश के मुताबिक, कथा के दौरान शराब के नशे में धुत कुछ युवक मौके पर पहुंचे। इनमें महिपाल यादव, संजीव यादव, भूरे यादव, राम यादव (नगला जींद निवासी), महेंद्र सिंह और रितिक कुमार (मेंदीपुर निवासी) शामिल बताए जा रहे हैं।
सभी के हाथों में लाठी-डंडे थे, और माहौल देखते ही देखते तनावपूर्ण हो गया। आरोप है कि इन लोगों ने जबरन भागवत कथा बंद कराने की धमकी दी, साउंड सिस्टम और मशीनों में तोड़फोड़ की और व्यास गद्दी पर बैठने की कोशिश की। जब ग्रामीणों ने विरोध किया, तो दबंगों ने तमंचा लहराया, जमकर मारपीट की और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया।इस हमले में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की तस्वीर को मंच से फेंक दिया गया, जिससे दलित समाज में जबरदस्त आक्रोश फैल गया। मारपीट में राहुल, बृजपाल, अखिलेश और गौरव गंभीर रूप से घायल हो गए।सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि घटना की जानकारी रात में ही पुलिस को दी गई, लेकिन आरोप है कि कोई तत्काल कार्रवाई नहीं की गई। इससे नाराज़ होकर अगले दिन बड़ी संख्या में ग्रामीण ट्रैक्टरों से थाने पहुंच गए और आरोपियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की।
मामले ने तूल पकड़ा तो पुलिस हरकत में आई। क्षेत्राधिकारी भरथना राम दमन मौर्य ने बताया कि पीड़ितों की तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। नामजद आरोपियों में से तीन को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि बाकी की तलाश में टीमें लगाई गई हैं।सवाल बड़ा है…क्या दलित समाज द्वारा धार्मिक आयोजन करना अब भी कुछ लोगों को बर्दाश्त नहीं? बाबा साहब की तस्वीर पर हमला सिर्फ तोड़फोड़ है या एक सोची-समझी मानसिकता? और सबसे बड़ा सवाल — इटावा की इस घटना पर सियासत की चुप्पी क्यों? इटावा की यह घटना न सिर्फ कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि समाज के उस चेहरे को भी उजागर करती है, जो आज भी बराबरी और सम्मान से डरता है।





