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राजनाथ ने की योगी की तारीफ तो पंकज पहुंचे शाह के पास ! यूपी से दिल्ली तक राजनीति तेज !

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उत्तर प्रदेश की सियासत अब बयानबाज़ी नहीं, बल्कि रणनीतिक युद्ध के मोड में पहुंच चुकी है। दिल्ली से लखनऊ तक हर मुलाकात, हर तारीफ और हर चुप्पी अपने भीतर एक बड़ा संकेत छिपाए हुए है। सवाल अब विपक्ष बनाम सत्ता का नहीं रहा—सवाल है सत्ता के भीतर सत्ता का।जैसे ही राजनाथ सिंह ने योगी आदित्यनाथ को “सबसे बेहतर मुख्यमंत्री” बताते हुए उनकी अर्थशास्त्रीय समझ तक की सराहना की, वैसे ही सियासी शतरंज की बिसात पर मोहरे चलने लगे। दिल्ली में हलचल तेज हुई, यूपी में संदेश गया और तुरंत पंकज चौधरी हरकत में आ गए। अमित शाह से लेकर ओबीसी नेताओं तक मुलाकातों की कतार लग गई।यानी साफ है 2027 की लड़ाई अब मैदान में नहीं, नेतृत्व के कंट्रोल रूम में लड़ी जा रही है। एक तरफ योगी आदित्यनाथ—जनता के भरोसे और संघ के समर्थन से मजबूत होते हुए। दूसरी तरफ संगठन की वह मशीनरी जो सत्ता की दिशा और दायरा तय करना चाहती है।

अब सवाल ये नहीं है कि बीजेपी जीतेगी या नहीं… सवाल ये है कि बीजेपी किसके चेहरे पर जीतेगी? उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त अपने चरम पर है। लगातार हो रही मुलाकातें, बंद कमरों की बैठकें और दिल्ली–लखनऊ के बीच तेज़ होते राजनीतिक संदेश इस बात का साफ संकेत हैं कि 2027 की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है। इसी बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान आया, जिसने पूरे सियासी घटनाक्रम को नई दिशा दे दी। राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जमकर तारीफ करते हुए उन्हें सिर्फ एक मजबूत राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि एक सक्षम अर्थशास्त्री तक बता दिया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश आज हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है और इसके पीछे योगी आदित्यनाथ की निर्णायक भूमिका है।

राजनीति में ऐसे बयान साधारण नहीं होते। राजनाथ सिंह का यह बयान साफ संकेत देता है कि आरएसएस और उनका खेमा योगी आदित्यनाथ को ही 2027 का चेहरा मानकर चल रहा है। लेकिन ठीक इसी तारीफ के बाद दिल्ली की राजनीति में हलचल तेज हो गई। यूपी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी तुरंत दिल्ली पहुंचे। वहां उन्होंने पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति, संगठनात्मक समीकरण और भविष्य के नेतृत्व को लेकर विस्तार से चर्चा की। अमित शाह से मिलने के बाद पंकज चौधरी का मिशन यहीं खत्म नहीं हुआ। उन्होंने कुर्मी समाज के बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री बी.एल. वर्मा से मुलाकात की, फिर अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल से बातचीत की।

इससे पहले वह बजरंग दल के अध्यक्ष और कुर्मी समाज के प्रभावशाली चेहरे विनय कटिहार से भी बंद कमरे में मुलाकात कर चुके थे। इन सभी बैठकों को अगर एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती है— पंकज चौधरी का पूरा फोकस कुर्मी समाज और ओबीसी समीकरण को मजबूत करने पर है। वजह भी साफ है।उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज लगभग 150 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखता है। बिहार की तरह यूपी में भी एक वर्ग चाहता है कि ओबीसी नेतृत्व को और आगे बढ़ाया जाए। इसी रणनीति के तहत लंबे समय से शांत बैठे विनय कटिहार अचानक सक्रिय हुए हैं। विनय कटिहार ने 2027 में अयोध्या से चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया वही अयोध्या, जहां राम मंदिर बनने के बावजूद बीजेपी को लोकसभा चुनाव में झटका लगा था। पंकज चौधरी से उनकी मुलाकात के बाद यह संकेत और मजबूत हो गया कि 2027 के लिए नए सामाजिक समीकरण गढ़े जा रहे हैं राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अमित शाह ने पंकज चौधरी को साफ निर्देश दिए हैं “अपनी मजबूत टीम तैयार करो।

” इसी निर्देश के तहत पंकज चौधरी पूरे प्रदेश में दौरे कर रहे हैं, विधायकों, संगठन पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कर रहे हैं और साफ कह रहे हैं कि 2027 का चुनाव दिल्ली के आदेश पर, अमित शाह के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। यहीं से असली टकराव की रेखा उभरती है। एक तरफ संगठन का नजरिया है—जहां यह माना जाता है कि संगठन सरकार से बड़ा होता है। दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली है जहां मजबूत मुख्यमंत्री, स्वतंत्र निर्णय और सीधा प्रशासनिक नियंत्रण केंद्र में रहता है। आरएसएस और राजनाथ सिंह का रुख साफ है। उनकी सोच है कि 2027 का चुनाव योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर लड़ा जाए और रणनीति भी वही हो, जो योगी तय करें। सबसे बड़ा विवाद टिकट बंटवारे को लेकर माना जा रहा है।सूत्रों के मुताबिक 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले योगी आदित्यनाथ ने करीब 36 प्रत्याशियों की सूची दिल्ली भेजी थी, लेकिन उनमें से अधिकतर नामों पर मुहर नहीं लगी।

पार्टी के भीतर अब यह चर्चा आम है कि अगर योगी की सूची को गंभीरता से लिया गया होता, तो शायद लोकसभा चुनाव में बीजेपी को इतनी बड़ी क्षति न उठानी पड़ती।इसी कड़ी में केशव प्रसाद मौर्य का पुराना बयान “संगठन सरकार से बड़ा होता है”अब एक बार फिर जमीन पर उतरता दिख रहा है। एक और सवाल भी लगातार उठ रहा है जब भूपेंद्र चौधरी प्रदेश अध्यक्ष थे, तब क्या उनकी इतनी मुलाकातें अमित शाह से होती थीं? क्या वह कभी इतने चर्चित रहे?जवाब साफ है नहीं।इसी बीच आरएसएस ने अपना दांव भी साफ कर दिया है।जल्द ही पूरे उत्तर प्रदेश में विराट हिंदू महासम्मेलन आयोजित किए जाएंगे, जिनका चेहरा और नेतृत्व योगी आदित्यनाथ होंगे। संघ मानता है कि योगी ही वह नेता हैं जो बीजेपी को 2027 में पार लगा सकते हैं। लेकिन सियासी गलियारों में यह भी चर्चा तेज है कि योगी आदित्यनाथ की स्वतंत्र कार्यशैली, उनकी लोकप्रियता और उनके फैसलों पर अंकुश लगाने की तैयारी चल रही है। एक पूरी लॉबी सक्रिय बताई जा रही है, जो नहीं चाहती कि योगी पूरी तरह फ्री हैंड के साथ चुनाव लड़ें।यानी लड़ाई अब विपक्ष से नहीं, बल्कि नेतृत्व, नियंत्रण और वर्चस्व की है।अब देखना यह है कि 2027 में उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा कौन तय करेगा दिल्ली या लखनऊ?संगठन या सरकार?या फिर… योगी बनाम सिस्टम? जंग शुरू हो चुकी है।

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