“जब मैं लखनऊ आया था, सर्दी में पहनने के लिए जूता तक नहीं था…” यह कहते-कहते उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक भावुक हो गए। मंच मेरठ का था और अवसर था नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर आयोजित कवि सम्मेलन का, लेकिन पल भर में माहौल कविता से निकलकर संघर्ष और संवेदना की सच्ची कहानी में बदल गया।
अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए पाठक जी की आंखें नम हो गईं। उन्होंने कहा कि उन्होंने गरीबी को बहुत करीब से देखा है, उसका दर्द जिया है। “मुझे गरीब का दर्द पता है,” यह वाक्य उनके शब्दों से नहीं, अनुभव से निकला हुआ लगा। शायद यही वजह है कि जब भी किसी जरूरतमंद को देखते हैं, तो भीतर तक व्यथित हो जाते हैं।

उनके समर्थकों का कहना है कि लखनऊ विश्वविद्यालय से पढ़ाई और छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर आज प्रदेश की सत्ता तक पहुंचा है, लेकिन उनके स्वभाव में सत्ता का अहंकार नहीं, बल्कि संघर्ष की विनम्रता दिखाई देती है। सुबह से देर रात तक जो भी उनके संपर्क में आता है, उससे वे आत्मीयता से मिलते हैं हालचाल पूछते हैं, भोजन कराते हैं और यथासंभव मदद का प्रयास करते हैं।
मौजूदा समय में उनके लखनऊ स्थित सरकारी आवास पर रोज़ सुबह जरूरतमंदों, पीड़ितों और दुखियारों की भीड़ इस बात की गवाही देती है कि राजनीति उनके लिए पद नहीं, सेवा है। हाल ही में उनके आवास पर सभी के लिए भोजन की व्यवस्था भी की गई एक ऐसा कदम जो उनके व्यक्तित्व की संवेदनशीलता को और गहराता है।
उनका यह रूप देखकर लोगों का कहना है कि बृजेश पाठक केवल एक उपमुख्यमंत्री नहीं, बल्कि उस पीढ़ी के नेता हैं जिन्होंने अभाव से उठकर संवेदना को नहीं छोड़ा,शायद यही कारण है कि मंच पर बहती उनकी आंखों में सिर्फ़ बीते दिनों की पीड़ा नहीं थी, बल्कि उस दर्द की झलक थी जिसे वे आज भी हर जरूरतमंद के चेहरे में देख लेते हैं।



