उत्तर प्रदेश की राजनीति आज किसी शांत प्रशासनिक प्रक्रिया की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे विस्फोटक मैदान की तरह दिखाई दे रही है जहाँ हर कदम फूंक-फूंककर रखा जा रहा है। सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक एक ही चर्चा है—योगी आदित्यनाथ को घेरने की कोशिशें अब पर्दे के पीछे नहीं रहीं है ।
बल्कि ट्विटर और फेसबुक पर ट्रेंड कर रहा “योगी उपयोगी है” महज़ समर्थन या विरोध का नारा नहीं है, बल्कि यह उस खींचतान का संकेत है जो भारतीय जनता पार्टी के भीतर इस समय पूरी ताकत से चल रही है। सवाल अब यह नहीं है कि यूपी में क्या हो रहा है, सवाल यह है कि यह सब किस दिशा में ले जाया जा रहा है।आज उत्तर प्रदेश अपना यूपी दिवस मना रहा है और ठीक उसी दिन देश के गृहमंत्री अमित शाह लखनऊ में मौजूद हैं। यह संयोग नहीं माना जा रहा। शाह का स्वागत योगी आदित्यनाथ, केशव प्रसाद मौर्य, बृजेश पाठक और पंकज चौधरी करते हैं, संगठन के तमाम बड़े चेहरे एक साथ मंच पर दिखते हैं, और बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य लगता है।
मंच से तारीफ होती है, डबल इंजन सरकार की बात होती है, विकास और कानून-व्यवस्था का गुणगान किया जाता है। लेकिन राजनीति में सबसे खतरनाक वह क्षण होता है, जब सब कुछ सामान्य दिखाया जा रहा हो और अंदर ही अंदर असामान्य हलचल चल रही हो। बीते कुछ दिनों से योगी आदित्यनाथ के खिलाफ जिस तरह का माहौल बन रहा है, वह अपने आप नहीं बनता। UGC को लेकर उठे विवाद, अलग-अलग समाजों में फैलती नाराज़गी, और फिर उसे योगी सरकार से जोड़ने की कोशिश यह सब एक सिलसिले की तरह सामने आ रहा है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा खुलेआम है कि योगी को सीधे हटाने की कोई कोशिश नहीं की जा रही, बल्कि उनकी सबसे मजबूत पूंजी उनकी लोकप्रियता और उनकी संत छवि पर धीरे-धीरे वार किया जा रहा है।
यह रणनीति ऐसी है जिसमें बीजेपी को 2027 में हार भी न झेलनी पड़े और योगी इतने ताकतवर भी न बन पाएं कि वे पार्टी के भीतर किसी के लिए चुनौती बन जाएँ। माघ मेले के दौरान अविमुक्तेश्वर नन्द सरस्वती और योगी सरकार के बीच टकराव इसी पृष्ठभूमि में एक बड़ा मोड़ बनकर सामने आता है। मुख्यमंत्री कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की बात करते हैं, प्रशासन खतरे की आशंका जताता है, और संत अपने सम्मान व परंपरा की दुहाई देते हैं। मामला यहीं थम सकता था, लेकिन शब्दों की तल्खी ने इसे राजनीतिक अखाड़े में बदल दिया। योगी का रुख सख्त रहता है, वे झुकते नहीं दिखते, और तभी इस विवाद में एक ऐसा मोड़ आता है जो पूरी राजनीति को हिला देता है। डिप्टी मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य खुले तौर पर संत के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। वे संत के चरणों में निवेदन करते हैं, जांच और कार्रवाई की बात करते हैं, और यह संकेत देते हैं कि प्रशासनिक सख्ती जरूरत से ज्यादा थी। इसके बाद अविमुक्तेश्वर नन्द सरस्वती का बयान आता है, जिसमें वे केशव प्रसाद मौर्य को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने योग्य बताते हैं और योगी आदित्यनाथ को हठी और जिद्दी करार देते हैं। यह बयान सिर्फ एक संत की नाराज़गी नहीं लगता, बल्कि सत्ता के भीतर चल रही रस्साकशी का सार्वजनिक प्रदर्शन बन जाता है।
यहीं से सवाल उठता है कि क्या बीजेपी वास्तव में एकजुट है या फिर पार्टी के भीतर साफ-साफ ध्रुवीकरण शुरू हो चुका है। जब मुख्यमंत्री अपनी सरकार और फैसलों के साथ खड़ा है, तब उसी सरकार का उपमुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से अलग लाइन लेता हुआ क्यों दिख रहा है। राजनीतिक जानकार इसे भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं मानते, बल्कि इसे महत्वाकांक्षा और रणनीति का हिस्सा मानते हैं। यह भी किसी से छुपा नहीं है कि केशव प्रसाद मौर्य लंबे समय से खुद को मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में देखते आए हैं। अमित शाह की लखनऊ मौजूदगी इस पूरी तस्वीर को और गहरा बना देती है। माना जा रहा है कि शाह सिर्फ यूपी दिवस के कार्यक्रम के लिए नहीं आए हैं।
संगठन और सरकार के बीच संतुलन, मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल और UGC जैसे मुद्दों पर मंथन—इन सब पर चर्चा चल रही है। मंच से योगी की तारीफ होना और अंदरखाने उनके इर्द-गिर्द घेरे को कसने की कोशिश—भारतीय राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है। शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे उदाहरण सामने हैं, जहाँ मंच से सम्मान और सत्ता से दूरी एक साथ चलती रही है। इस पूरे घटनाक्रम में RSS की भूमिका सबसे अहम बनी हुई है। संघ फिलहाल खुलकर कुछ नहीं कह रहा, लेकिन उसकी निगाहें हर गतिविधि पर टिकी हुई हैं। संघ योगी आदित्यनाथ को एक वैचारिक और निर्णायक नेता के रूप में देखता है और यह संदेश साफ है कि सार्वजनिक रूप से योगी के खिलाफ जाने वालों को बगावत की श्रेणी में रखा जा सकता है। यही कारण है कि कोई भी नेता खुलकर योगी विरोधी मोर्चा लेने से हिचक रहा है, लेकिन अंदरखाने हलचल थमी नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त बेहद नाज़ुक दौर से गुजर रही है। योगी आदित्यनाथ झुकते नहीं दिख रहे, विरोध करने वाले पीछे हटते नहीं दिख रहे, और दिल्ली संतुलन साधने में जुटी है। यह टकराव अभी सतह पर पूरी तरह नहीं आया है, लेकिन संकेत साफ हैं कि आने वाले समय में यह और तेज होगा। फिलहाल सब कुछ नियंत्रण में दिखाया जा रहा है, लेकिन राजनीति में सबसे खतरनाक वही दौर होता है जब विस्फोट से पहले सन्नाटा छा जाता है। उत्तर प्रदेश आज उसी सन्नाटे में खड़ा है, और हर किसी को पता है कि यह सन्नाटा ज्यादा देर तक टिकने वाला नहीं है।





