UGC को लेकर देश में सियासी आग भड़क चुकी है। सड़कों पर तनाव है, बयानों में जहर है और सत्ता के गलियारों में खामोशी सबसे बड़ा सवाल बन चुकी है। एक तरफ दलित संगठन और सामान्य जाति आमने-सामने खड़े हैं, तो दूसरी तरफ सत्ता पक्ष के विधायक, ब्राह्मण-ठाकुर चेहरे और बड़े कद्दावर नेता यूजीसी पर रहस्यमयी चुप्पी साधे बैठे हैं।
सवाल यही है—जब आग लगी है, तो जिम्मेदार लोग बोल क्यों नहीं रहे? इसी बीच दलित राजनीति खुलकर मैदान में उतर चुकी है।पहले आज़ाद समाज पार्टी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने दो टूक चेतावनी दी “अगर 15% लोग सड़कों पर उतरेंगे, तो 85% भी सड़कों पर उतरकर मुंहतोड़ जवाब देंगे।” इस बयान ने विवाद को और भड़का दिया। और अब इस सियासी टकराव में बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती की एंट्री ने पूरे मुद्दे को नया मोड़ दे दिया है।मायावती ने यूजीसी के नए नियमों का खुलकर समर्थन करते हुए साफ शब्दों में कहा कि देश की उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिवादी भेदभाव को खत्म करने के लिए यूजीसी द्वारा सरकारी कॉलेजों और निजी विश्वविद्यालयों में ‘इक्विटी कमेटी’ (समता समिति) गठित करने का फैसला जरूरी और सही है।
उन्होंने यह भी कहा कि सामान्य वर्ग की केवल जातिवादी मानसिकता रखने वाली कुछ ताकतें इसे अपने खिलाफ साजिश बताकर विरोध कर रही हैं, जो कतई उचित नहीं है। हालांकि मायावती ने सरकार को आईना भी दिखाया। उन्होंने माना कि अगर इन नियमों को लागू करने से पहले सभी वर्गों को विश्वास में लिया जाता, तो शायद देश को इस सामाजिक तनाव का सामना नहीं करना पड़ता। सरकारों और संस्थानों को ऐसे संवेदनशील मामलों में ज़्यादा सतर्कता और संवाद की जरूरत है। इतना ही नहीं, मायावती ने दलित-पिछड़े समाज को भी सख्त संदेश देते हुए कहा कि इन वर्गों को अपने ही समाज के स्वार्थी, बिकाऊ और भड़काऊ नेताओं के बहकावे में नहीं आना चाहिए, जो ऐसे मुद्दों की आड़ में सिर्फ घिनौनी राजनीति करते हैं। उन्होंने साफ अपील की कि दलित और पिछड़े वर्ग सतर्क रहें और किसी के मोहरे न बनें।कुल मिलाकर, यूजीसी का मुद्दा अब सिर्फ शिक्षा नीति नहीं रहा यह सामाजिक टकराव, सियासी ध्रुवीकरण और नेतृत्व की चुप्पी का बड़ा टेस्ट बन चुका है। आने वाले दिनों में सवाल यही रहेगा क्या सरकार इस आग को संवाद से बुझाएगी, या फिर यह मुद्दा सड़कों से संसद तक और भड़केगा?


