Home Political news यूपी की सियासत में ‘बड़ा खेल’! 2027 से पहले बंद कमरों में...

यूपी की सियासत में ‘बड़ा खेल’! 2027 से पहले बंद कमरों में क्या पक रहा है?

70
0

उत्तर प्रदेश की सियासत इस वक्त सिर्फ गरम नहीं है… उबाल पर है। और ये उबाल यूं ही नहीं आया—इसके पीछे चल रही है परदे के पीछे की वो सियासी हलचल, जो 2027 के चुनाव की दिशा और दशा दोनों तय कर सकती है। एक तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पश्चिम बंगाल की जमीन पर भाजपा के लिए माहौल बना रहे हैं, अपनी रैलियों में ऐसी दहाड़ लगा रहे हैं कि लोग दूसरी पार्टियों की सभाएं छोड़कर उन्हें सुनने पहुंच रहे हैं… और दूसरी तरफ, उनके अपने राज्य उत्तर प्रदेश में—उनकी गैरमौजूदगी में—कुछ बड़ा पक रहा है। लखनऊ… सत्ता का केंद्र… कालिदास मार्ग… और वहां लगातार चल रही हैं बंद कमरे की मीटिंग्स। बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े का अचानक यूपी में डेरा डालना, एक-एक करके बड़े नेताओं से मुलाकात करना—ये कोई सामान्य राजनीतिक गतिविधि नहीं मानी जा रही। पंकज चौधरी से मुलाकात, फिर केशव प्रसाद मौर्य, उसके बाद बृजेश पाठक… और फिर वही पंकज चौधरी सीधे दिल्ली पहुंचकर अमित शाह से रिपोर्ट सौंपते हैं। इससे पहले केशव मौर्य भी दिल्ली जाकर मुलाकात कर चुके थे। अब सवाल ये उठता है—आखिर इतनी भागदौड़ क्यों? सूत्र साफ इशारा कर रहे हैं—ये बैठकों का सिलसिला सिर्फ संगठनात्मक समीक्षा नहीं है, बल्कि 2027 की चुनावी बिसात बिछाई जा रही है। और इस बिसात पर सबसे बड़ा सवाल है—चेहरा कौन होगा? क्या बीजेपी 2027 का चुनाव फिर से योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर लड़ेगी? या फिर किसी नए—खासतौर पर पिछड़े वर्ग के चेहरे—को आगे लाने की रणनीति बन रही है? यही वो सवाल है, जिसने इन बैठकों को और भी ज्यादा गंभीर बना दिया है।

इधर तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही दिलचस्प है। योगी आदित्यनाथ पश्चिम बंगाल में जिस अंदाज में प्रचार कर रहे हैं, वो खुद में एक बड़ा राजनीतिक संदेश है। उनकी रैलियों में भीड़, ‘जय श्री राम’ के नारे, बुलडोजर मॉडल की चर्चा, माफिया को “मिट्टी में मिलाने” वाली भाषा—ये सब बंगाल की राजनीति में एक नई ऊर्जा भरते दिख रहे हैं। यहां तक कि बीजेपी के बड़े नेता शुभेंदु अधिकारी तक मंच पर योगी के पैर छूते नजर आते हैं और उन्हें “हिंदुत्व का विराट स्वरूप” बताते हैं। राजनीतिक गलियारों में तो यहां तक कहा जा रहा है कि जो असर मोदी और शाह बंगाल में नहीं छोड़ पाए, वो असर योगी छोड़ते नजर आ रहे हैं। अब यहीं से कहानी और दिलचस्प हो जाती है। एक तरफ योगी की बढ़ती लोकप्रियता, दूसरी तरफ यूपी में उनके बिना हो रही हाई-लेवल मीटिंग्स… क्या ये सिर्फ संयोग है? या इसके पीछे कोई गहरी रणनीति छिपी है? विनोद तावड़े ने सिर्फ बड़े नेताओं से ही नहीं, बल्कि महिला नेताओं—रजनी तिवारी, बेबी रानी मौर्य, बबीता चौहान—से भी लंबी बातचीत की। इसके अलावा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और सूर्य प्रताप शाही से भी चर्चा हुई। यानी फीडबैक हर वर्ग, हर स्तर से लिया जा रहा है—संगठन, सरकार, जातीय समीकरण, महिला प्रतिनिधित्व—सब कुछ टेबल पर है। सूत्रों की मानें तो तीन बड़े मुद्दों पर मंथन हो रहा है,,,पहला संगठन में बड़ा बदलाव ,,दूसरा मंत्रिमंडल में फेरबदल,,तीसरा और सबसे अहम—2027 का मुख्यमंत्री चेहरा,,,यही नहीं, विधायकों और कार्यकर्ताओं से ग्राउंड फीडबैक लेने की भी तैयारी है, ताकि जमीनी सच्चाई सीधे हाईकमान तक पहुंचे। इसके बाद एक विस्तृत रिपोर्ट अमित शाह को सौंपी जाएगी, और फिर वहीं से तय होगा यूपी का अगला राजनीतिक रोडमैप।

ALSO READ:डॉ. भीमराव अंबेडकर: समानता, शिक्षा और क्रांति की आवाज़

इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प चीज सामने आई—जब पंकज चौधरी योगी आदित्यनाथ से मिले, तो उनके हाथ में एक गुलाबी फाइल थी। कहा जा रहा है कि उसी फाइल में वो पूरा रिपोर्ट कार्ड था, जो हाईकमान तक पहुंचना था। यानी योगी से भी फीडबैक लिया गया… लेकिन सवाल ये है—अगर सब कुछ ठीक है, तो फिर इतनी गहन समीक्षा क्यों? क्या बीजेपी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती? या फिर पार्टी के अंदर ही कोई ऐसा समीकरण बन रहा है, जो आने वाले समय में बड़ा बदलाव ला सकता है? उधर योगी बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं, इधर यूपी में उनके नेतृत्व को लेकर चर्चा हो रही है। ये विरोधाभास ही इस पूरी कहानी को और ज्यादा रहस्यमयी बना देता है। अंत में फैसला दिल्ली में होगा—अमित शाह, नरेंद्र मोदी और शीर्ष नेतृत्व मिलकर तय करेंगे कि यूपी की राजनीति में 2027 में किसका चेहरा चमकेगा… और किसका असर कम होगा। लेकिन फिलहाल, इतना तय है—उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ बड़ा होने वाला है। और जब भी लखनऊ में बंद कमरों में इतनी हलचल होती है… तो उसका असर सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं रहता—दिल्ली तक उसकी गूंज सुनाई देती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here