पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से खास रही है। यहां एक बार जो पार्टी सत्ता में आती है, वह कई सालों तक राज करती है। आजादी के बाद से अब तक सिर्फ तीन पार्टियों ने राज्य पर शासन किया है—कांग्रेस, वाम दल (लेफ्ट) और तृणमूल कांग्रेस (TMC)। हर पार्टी ने लंबे समय तक सत्ता संभाली, जो अपने आप में एक अलग ही पैटर्न दिखाता है।
इस कहानी की शुरुआत साल 1990 से होती है, जब कोलकाता में बस किराया बढ़ाने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुआ। उस दौरान पुलिस फायरिंग में तीन लोगों की मौत हो गई। इसी विरोध के दौरान ममता बनर्जी पर हमला हुआ, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। बाद में उन्होंने अपनी किताब में इस घटना का जिक्र भी किया। यह घटना उनके राजनीतिक जीवन का एक बड़ा मोड़ साबित हुई।इसके कुछ साल बाद, 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई। फिर 2011 में उन्होंने 34 साल से सत्ता में रही लेफ्ट सरकार को हटा दिया और खुद मुख्यमंत्री बनीं। तब से आज तक बंगाल की राजनीति में उनका दबदबा बना हुआ है।अगर देखा जाए, तो बंगाल में किसी पार्टी के लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के पीछे कई वजहें हैं।
पहली वजह है मजबूत संगठन (कैडर सिस्टम)।
बंगाल में हर बड़ी पार्टी का जमीनी स्तर तक मजबूत नेटवर्क होता है। गांव-गांव और मोहल्लों तक पार्टी के कार्यकर्ता जुड़े होते हैं, जो लोगों की समस्याएं सुनते हैं और उन्हें पार्टी तक पहुंचाते हैं। पहले यह ताकत लेफ्ट के पास थी, लेकिन बाद में TMC ने इसे अपने पक्ष में कर लिया।
दूसरी वजह है ‘बंगाली अस्मिता’ का मुद्दा।
यहां के लोग अपनी पहचान को लेकर बहुत सजग रहते हैं। अक्सर राजनीति में ‘दिल्ली बनाम बंगाल’ का नैरेटिव भी चलता है। लेफ्ट और TMC दोनों ने इस भावना का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया है।
तीसरी वजह है मजबूत नेतृत्व (पर्सनैलिटी कल्ट)।
बंगाल की राजनीति हमेशा किसी बड़े चेहरे के इर्द-गिर्द घूमती रही है। पहले डॉ. बिधानचंद्र रॉय, फिर ज्योति बसु और अब ममता बनर्जी—इन नेताओं के नाम पर लोगों ने लंबे समय तक वोट दिया।
चौथी वजह है सही वोटबैंक मैनेजमेंट।
हर पार्टी ने अपने-अपने तरीके से खास वर्गों को साधा। कांग्रेस ने पढ़े-लिखे वर्ग पर ध्यान दिया, लेफ्ट ने किसानों और मजदूरों को जोड़ा, जबकि TMC ने महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर फोकस किया।
पांचवीं और सबसे अहम वजह है कमजोर विपक्ष।
जब भी विपक्ष बिखरा हुआ रहा, तब सत्ताधारी पार्टी को फायदा मिला। यही कारण है कि बंगाल में अक्सर दो पार्टियों के बीच ही सीधी टक्कर देखने को मिलती है।
अब सवाल उठता है कि क्या भविष्य में बीजेपी भी इस पैटर्न को दोहरा सकती है?
पिछले कुछ सालों में बीजेपी ने बंगाल में तेजी से अपनी पकड़ बनाई है। 2016 में जहां उसके पास सिर्फ 3 सीटें थीं, वहीं 2021 में यह संख्या 77 तक पहुंच गई। वोट शेयर भी काफी बढ़ा है।
हालांकि, अभी भी बीजेपी के सामने कई चुनौतियां हैं। पार्टी के पास मजबूत चेहरा और कुछ हद तक संगठन है, लेकिन TMC के मुकाबले उसका जमीनी नेटवर्क कमजोर माना जाता है। साथ ही, ‘बंगाली अस्मिता’ का मुद्दा अभी भी ममता बनर्जी के पक्ष में जाता है।
कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां सत्ता बदलना आसान नहीं होता। जो पार्टी लोगों का भरोसा जीत लेती है, वह लंबे समय तक टिकती है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह पैटर्न जारी रहता है या फिर कोई नया बदलाव देखने को मिलता है।






