बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव के बाद सत्ता का नया चेहरा उभरकर सामने आया है। नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद अब राज्य की कमान सम्राट चौधरी संभालने जा रहे हैं, जो आज मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं।
संघर्ष से शिखर तक का सफर
सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ाव से होकर गुज़रा है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी से की थी। बेहद कम उम्र में ही उन्होंने राजनीति में पहचान बना ली और राबड़ी देवी की सरकार में सबसे युवा मंत्रियों में शामिल हुए। हालांकि उम्र को लेकर विवाद के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
पार्टी बदलने के बाद बदली किस्मत
आरजेडी से अलग होने के बाद सम्राट चौधरी ने जेडीयू का रुख किया। जीतन राम मांझी के मुख्यमंत्री कार्यकाल में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनने का मौका मिला। लेकिन जेडीयू में अपेक्षित महत्व न मिलने के कारण उनका झुकाव दूसरी दिशा में हो गया।
बीजेपी में मिला बड़ा मंच
साल 2018 में उन्होंने बीजेपी जॉइन की और यहीं से उनका राजनीतिक ग्राफ तेजी से ऊपर गया। पार्टी संगठन में उनकी पकड़ मजबूत होती गई—पहले प्रदेश उपाध्यक्ष, फिर विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष और बाद में प्रदेश अध्यक्ष तक का सफर उन्होंने कम समय में तय किया।
जब नीतीश कुमार ने महागठबंधन का साथ छोड़ा और फिर से एनडीए में वापसी की, तब सम्राट चौधरी को डिप्टी सीएम की जिम्मेदारी दी गई।
परिवार से मिली सियासी विरासत
सम्राट चौधरी का राजनीतिक आधार उनके पिता शकुनी चौधरी से जुड़ा है, जो बिहार की राजनीति में एक मजबूत ओबीसी चेहरा रहे। उन्होंने कई दलों में रहकर विधायक और सांसद के रूप में लंबा अनुभव हासिल किया।
अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी
लंबे राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक पकड़ और बदलते समीकरणों के बीच अब सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में नई भूमिका में नजर आएंगे। उनकी अगुवाई में राज्य की राजनीति किस दिशा में जाती है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।






