इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक अहम फैसले में लखनऊ के जिलाधिकारी (DM) और अपर जिलाधिकारी न्यायिक (ADM Judicial) पर 20-20 हजार रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया है, यह कार्रवाई भूमि विवाद से जुड़े एक मामले में कथित तौर पर अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर की गई प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर की गई है।
कोर्ट ने कहा — “प्रशासनिक अतिरेक हुआ”
19 मई को पारित इस आदेश को शनिवार को हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया गया, अदालत ने स्पष्ट कहा कि दोनों अधिकारियों ने अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की, जिसे “प्रशासनिक अतिरेक” माना गया है, कोर्ट के अनुसार, इस कार्रवाई के कारण याचिकाकर्ता को अनावश्यक मानसिक और कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ा और उसे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत का रुख करना पड़ा।
क्या था पूरा मामला?
मामला लखनऊ में एक भूमि विवाद से जुड़ा हुआ है, जिसमें शिकायत मिलने के बाद ADM (न्यायिक) ने याचिकाकर्ता को जमीन बेचने और निर्माण कार्य करने से रोकने का आदेश जारी कर दिया था, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता मोहित मिश्रा ने अदालत को बताया कि यह कार्रवाई उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा 104 और 105 के तहत की गई, जबकि इस मामले में अधिकारियों के पास वैधानिक अधिकार ही नहीं था।
राजस्व रिकॉर्ड में पहले से दर्ज थी जमीन
कोर्ट में यह भी बताया गया कि संबंधित भूमि पहले से ही राजस्व अभिलेखों में याचिकाकर्ता के नाम दर्ज थी, बावजूद इसके प्रशासनिक स्तर पर हस्तक्षेप किया गया।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में लखनऊ के DM और ADM (न्यायिक) के आचरण पर गंभीर आपत्ति जताई, अदालत ने कहा कि किसी भी कार्रवाई से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि संबंधित अधिकारी को उस विषय में कानूनी अधिकार प्राप्त है या नहीं, कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना उचित कानूनी जांच के ऐसे आदेश पारित करना न्यायसंगत नहीं है और यह सीधे तौर पर अधिकार क्षेत्र के दुरुपयोग का मामला है।
जुर्माना व्यक्तिगत रूप से जमा करने का आदेश
अदालत ने दोनों अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे 20-20 हजार रुपये का जुर्माना अपने वेतन या व्यक्तिगत आय से सरकारी कोष में जमा करें, यह फैसला प्रशासनिक जवाबदेही और कानूनी प्रक्रिया के पालन को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है, यह मामला प्रशासनिक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र और जवाबदेही को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है, हाईकोर्ट की यह सख्त टिप्पणी भविष्य में ऐसी कार्रवाईयों पर अंकुश लगाने का संकेत देती है।






