लखनऊ। समाजवादी पार्टी में एक बार फिर चाचा-भतीजे की सियासत चर्चा के केंद्र में है। डॉ. राम मनोहर लोहिया ट्रस्ट की कमान अब अखिलेश यादव के हाथों में आने के बाद शिवपाल यादव को लेकर सियासी हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। लोहिया ट्रस्ट समाजवादी विचारधारा और लोहियावादी राजनीति से जुड़ा महत्वपूर्ण मंच माना जाता है, ऐसे में नेतृत्व में हुए इस बदलाव को महज संगठनात्मक फैसला नहीं बल्कि 2027 की चुनावी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
शिवपाल यादव लंबे समय से लोहिया की विचारधारा और समाजवादी राजनीति से जुड़े रहे हैं। ऐसे में ट्रस्ट के अध्यक्ष पद से उनकी विदाई को लेकर बीजेपी ने समाजवादी पार्टी पर हमला बोल दिया है। बीजेपी का आरोप है कि समाजवादी पार्टी में अब समाजवादी विचारधारा से ज्यादा परिवार की राजनीति हावी हो गई है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि जिस लोहिया के नाम और विचारधारा को समाजवादी पार्टी अपनी राजनीति का आधार बताती है, उसी लोहिया ट्रस्ट में शिवपाल यादव की भूमिका खत्म किया जाना कई सवाल खड़े करता है।
बीजेपी के हमले को सहयोगी दलों की ओर से भी धार मिलती नजर आ रही है। योगी सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर भी समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर निशाना साधते रहे हैं। राजभर का सियासी हमला खास तौर पर परिवारवाद और पिछड़े वर्ग की राजनीति को लेकर रहता है। ऐसे में शिवपाल को लोहिया ट्रस्ट से हटाए जाने के मुद्दे ने विपक्षी दलों को सपा पर हमला करने का एक और मौका दे दिया है।
सवाल सिर्फ लोहिया ट्रस्ट के अध्यक्ष पद का नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी और उससे जुड़े सभी प्रमुख संस्थानों पर अपनी पकड़ और मजबूत कर रहे हैं? क्या पार्टी की कमान पूरी तरह नई पीढ़ी के हाथों में केंद्रित करने की रणनीति तैयार हो रही है? और सबसे बड़ा सवाल? क्या शिवपाल यादव को सियासी तौर पर किनारे करने की प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी?
हालांकि अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच रिश्तों में उतार-चढ़ाव का लंबा राजनीतिक इतिहास रहा है। कभी दोनों के बीच खुलकर मतभेद सामने आए, तो कभी विधानसभा चुनावों और दूसरे राजनीतिक मौकों पर दोनों एक मंच पर भी दिखाई दिए। 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान चाचा-भतीजे की नजदीकी ने यह संकेत दिया था कि समाजवादी परिवार के भीतर पुरानी खाई को पाटने की कोशिश हो रही है। लेकिन अब लोहिया ट्रस्ट में नेतृत्व परिवर्तन ने एक बार फिर राजनीतिक चर्चाओं को हवा दे दी है।
बीजेपी इस पूरे घटनाक्रम को समाजवादी पार्टी के भीतर चल रही कथित खींचतान से जोड़ रही है। बीजेपी का संदेश साफ है सपा में संगठन और विचारधारा से ज्यादा परिवार और राजनीतिक नियंत्रण की लड़ाई है। वहीं ओम प्रकाश राजभर जैसे सहयोगी नेता भी इस मुद्दे को पिछड़ा वर्ग और परिवारवाद की राजनीति से जोड़कर सपा को घेरने की कोशिश कर सकते हैं।
2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि समाजवादी पार्टी इस बार अपने सामाजिक समीकरण को और मजबूत करने की कोशिश में है। PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के समीकरण को लेकर अखिलेश यादव लगातार राजनीति कर रहे हैं। दूसरी तरफ बीजेपी का फोकस सपा के इसी सामाजिक समीकरण को चुनौती देने पर है। ऐसे में शिवपाल यादव की राजनीतिक भूमिका भी आने वाले समय में महत्वपूर्ण हो सकती है।
लोहिया ट्रस्ट में बदलाव से एक और सवाल उठता है—क्या समाजवादी आंदोलन की पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच राजनीतिक संक्रमण पूरा हो चुका है? अखिलेश यादव अब पार्टी के साथ-साथ समाजवादी विरासत से जुड़े संस्थानों पर भी अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं, जबकि शिवपाल यादव की सक्रिय राजनीति और उनका अपना राजनीतिक प्रभाव अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
ऐसे में 2027 से पहले लोहिया ट्रस्ट का यह घटनाक्रम महज एक पद परिवर्तन नहीं माना जा रहा। इसके राजनीतिक संदेश दूर तक जा सकते हैं। बीजेपी इसे परिवारवाद के मुद्दे पर भुनाने की कोशिश करेगी, ओम प्रकाश राजभर जैसे सहयोगी नेता सपा के सामाजिक समीकरण पर सवाल उठाएंगे और समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती होगी कि वह इस बदलाव को संगठनात्मक फैसला साबित करे या फिर इसे लेकर उठ रही राजनीतिक अटकलों का जवाब दे। अब निगाह इस बात पर है कि शिवपाल यादव की अगली राजनीतिक भूमिका क्या होगी और क्या 2027 की चुनावी बिसात पर चाचा-भतीजे फिर एक साथ नजर आएंगे या समाजवादी परिवार की सियासत में एक नया अध्याय शुरू होगा।
