ब्राह्मणों और ठाकुरों के सामने झुकने को मजबूर हुई मोदी सरकार? UGC के मुद्दे पर आखिर क्यों बदलने लगा BJP हाईकमान का रुख? क्या दिल्ली के आंदोलन ने BJP को यह एहसास करा दिया है कि जिस सामान्य वर्ग को उसका सबसे भरोसेमंद समर्थक और साथी माना जाता था, वही अब उससे दूर हो गया है और दिल्ली को अपने पुराने साथियों को फिर से साधने पर मजबूर कर दिया है? जी हां सत्ता के गलियारों से लेकर दिल्ली की सड़कों तक इस वक्त सिर्फ एक ही गूंज है—क्या केंद्र की मोदी सरकार अपने ही सबसे वफादार वोट बैंक के गुस्से के आगे झुकने पर मजबूर हो गई है?

यूजीसी आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट के मुद्दे पर देश में मचे राजनीतिक बवंडर के बीच बीजेपी हाईकमान के भीतर गहरी खलबली है। राजधानी दिल्ली में वामपंथियों, कम्युनिस्टों और अराजक तत्वों के उग्र प्रदर्शनों ने केंद्र सरकार को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि यूजीसी जैसे फैसलों से शायद उनसे कोई बड़ी सियासी भूल हो गई है। स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने साफ लफ्ज़ों में कह दिया है कि “यूजीसी कानून किसी भी कीमत पर देश में लागू नहीं होगा और सरकार ने अदालत में भी अपना रुख स्पष्ट कर दिया है।” राजनीतिक सूत्रों की मानें तो बीजेपी हाईकमान के भीतर बैठकों और मंथन का दौर जारी है। पार्टी को इस बात का अहसास हो चुका है कि जब से उसका सबसे भरोसेमंद और पारंपरिक जनाधार—यानी सवर्ण समाज, ब्राह्मण, क्षत्रिय और सनातनी युवा—उससे दूर छिटकने लगा है, तब से पार्टी की राजनीतिक स्थिति लगातार नाजुक होती जा रही है। एक तरफ जहां सरकार अपने सालों के सुशासन के दावों को जनता के बीच ले जाने में जुटी थी, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली की सड़कों पर सरकार के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा मोर्चा खुल चुका है। विपक्ष और वामपंथी छात्र संगठन इस असंतोष का फायदा उठाकर सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकने की साजिश में जुटे हैं। यह सियासी संकट सिर्फ एक कानून तक सीमित नहीं दिख रहा है। 10 तारीख को विपक्षी नेताओं, वामपंथी विचारकों और सरकार-विरोधी चेहरों का एक बड़ा जमघट दिल्ली में एक और विशाल आंदोलन की तैयारी कर रहा है।

आरोप है कि छात्रों और युवाओं के आंदोलन की आड़ में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है और देश के संवैधानिक ढांचे पर निशाना साधा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि अगर सही समय पर बीजेपी ने अपने नाराज समर्थकों को नहीं साधा, तो 2027 में आने वाले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। हालाँकि, इस पूरे घटनाक्रम के बीच अब एक नया मोड़ भी देखने को मिल रहा है। दिल्ली की सड़कों पर बढ़ते अराजक माहौल को देखते हुए अब देश के राष्ट्रवादी और धर्मप्रेमी संगठन भी हरकत में आ गए हैं। सोशल मीडिया से लेकर धरातल तक, सरकार और दिल्ली पुलिस के समर्थन में सनातनी युवा एक बार फिर एकजुट होते दिख रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह वर्ग समय रहते एकजुट नहीं हुआ, तो देश में अस्थिरता की वैसी ही स्थिति पैदा हो सकती है जैसी हाल के दिनों में कई पड़ोसी देशों और वैश्विक मंचों पर देखने को मिली है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या मोदी सरकार समय रहते यूजीसी जैसे विवादित मुद्दों पर अपने कदम पूरी तरह पीछे खींचकर अपने सबसे मजबूत किले को बचा पाएगी, या फिर विरोधियों के इस चौतरफा चक्रव्यूह में अपनी राजनीतिक पकड़ गंवा बैठेगी? आगामी कुछ दिन भारतीय राजनीति की नई दिशा तय करने वाले साबित होंगे।
