इकरा हसन के भाई का विवादित बयान — मायावती को कहा “मोदी के गोद में बैठने वाली कुंवारी”, सियासत में फिर गरमाया महिला सम्मान का मुद्दा
सियासत का नया विवाद: इकरा हसन पर अपमानजनक टिप्पणी से मचा बवाल
उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की युवा सांसद इकरा हसन हाल ही में उस वक्त सुर्खियों में आईं जब कुछ लोगों ने उन्हें “मुल्ली” और “आतंकवादी” कह दिया। इकरा भावुक होकर बोलीं—
“इसमें मेरी क्या गलती है?” उन्होंने अपने सम्मान और पहचान की बात की, जिसके बाद सोशल मीडिया और सियासी गलियारों में उनके समर्थन की लहर दौड़ पड़ी।
लेकिन राजनीति में कहा जाता है — “सियासत में कर्मों का ब्याज बहुत बड़ा होता है”। आज जो दूसरों की पीड़ा महसूस कर रही हैं, वही कभी दूसरों के अपमान पर मौन थीं।
इकरा के भाई नाहिद हसन ने मायावती पर दिया था विवादित बयान
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में इकरा हसन के भाई और सपा नेता नाहिद हसन ने बसपा सुप्रीमो मायावती के बारे में बेहद अशोभनीय टिप्पणी की थी।
उन्होंने कहा था —
“मायावती भी कुंवारी हैं, मोदी भी कुंवारे हैं, और मायावती तीन बार मोदी की गोद में बैठ चुकी हैं।”
यह बयान न सिर्फ मायावती का, बल्कि पूरे महिला समाज और दलित सम्मान का अपमान था। तब समाजवादी पार्टी और इकरा हसन दोनों खामोश थीं।
तब चुप रहने वाले आज महिला सम्मान के पैरोकार क्यों?
जब नाहिद हसन ने मायावती पर अपमानजनक टिप्पणी की, तब न तो इकरा ने आवाज उठाई, न सपा ने विरोध किया, और न ही भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने कोई बयान दिया।
लेकिन अब, जब इकरा हसन को अपमानजनक शब्द कहे गए, तो वही चंद्रशेखर आजाद मंच पर बोले —
“इकरा मेरी छोटी बहन है, उसके खिलाफ जो कहा गया वह गलत है। मुस्लिम, गुर्जर और दलित समाज को मिलकर उसे न्याय दिलाना चाहिए।”
सवाल उठता है — क्या महिला सम्मान सिर्फ तब याद आता है जब राजनीतिक समीकरण अनुकूल हों?
सियासत का डबल स्टैंडर्ड: संवेदना भी अब पार्टी देखकर तय होती है
यह घटना बताती है कि आज की राजनीति में सम्मान और संवेदना भी चयनात्मक हो चुकी है। जब अपमान “अपने” पक्ष से होता है, तो सन्नाटा रहता है। जब “दूसरों” से होता है, तो सियासत भावनात्मक हो जाती है। सच यह है कि राजनीति में अब सम्मान भी वोट देखकर तय होता है, संवेदना सीट देखकर आती है, और बहन वही बनती है जो राजनीतिक समीकरण में फिट बैठती है।
क्या चंद्रशेखर का बयान संवेदना था या रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चंद्रशेखर आज़ाद का यह बयान सिर्फ सहानुभूति नहीं, बल्कि रणनीतिक कदम है। उनका फोकस सपा के मुस्लिम वोट बैंक पर है, और इकरा हसन का मुद्दा उठाकर वे मुस्लिम-दलित एकता का नया समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीति में महिला सम्मान कब गैर-राजनीतिक बनेगा?
किसी भी महिला के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल निंदनीय है — चाहे वह इकरा हसन हों, मायावती, स्मृति ईरानी या कोई और। लेकिन जब तक दल अपने हितों के हिसाब से संवेदनशीलता तय करेंगे, महिला सम्मान राजनीति का औजार बना रहेगा, सिद्धांत नहीं।
राजनीति में स्थायी कुछ नहीं, बस अवसर स्थायी हैं
आज इकरा हसन “छोटी बहन” हैं, कल किसी और नेता की “राजनीतिक बहन” बन जाएंगी। लेकिन यह सिलसिला तब तक नहीं रुकेगा,
जब तक नेता यह नहीं समझेंगे कि —
“महिला का सम्मान दलों के हिसाब से नहीं, इंसानियत के हिसाब से होना चाहिए।”



