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अमरमणि त्रिपाठी: पूर्वांचल की वह सत्ता, जिसके सामने सरकारें भी सलामी देती थीं

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आज जब उत्तर प्रदेश “माफिया मुक्त प्रदेश” बनने की बात कर रहा है,तो एक नाम इतिहास के पन्नों से उठकर सिस्टम को आईना दिखाता है अमरमणि त्रिपाठी।यह वह दौर था जब बनारस के बृजेश सिंह जैसे नाम,गोरखपुर के इस बाहुबली के दरबार में हाज़िरी लगाए बिना टेंडर भी पास नहीं करा सकते थे।

ठेके, खनन, ज़मीन,सबकी चाबी एक ही जेब में रहती थी।और वह जेब सरकार की नहीं अमरमणि त्रिपाठी की थी। सरकार सपा की हो, भाजपा की या बसपा की अमरमणि हर सरकार का हिस्सा थे। छह बार विधायक और हर बार सत्ता में।कहा जाता है, अगर अमरमणि त्रिपाठी न होते, तो 2005 में ही बृजेश सिंह इतिहास बन चुके होते।एनकाउंटर से बचने के लिए बाहुबली बाहुबली की शरण में थे यह उस सिस्टम की असली तस्वीर है।

9 मई 2003 लखनऊ की पेपरमिल कॉलोनी में 24 साल की कवियत्री मधुमिता शुक्ला की गोली मारकर हत्या क्र दी गयी पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने यूपी की राजनीति में भूकंप ला दिया मधुमिता गर्भवती थीं।

और डीएनए रिपोर्ट ने बताया बच्चा अमरमणि त्रिपाठी का था। यहीं से सत्ता की परतें उतरने लगीं। 2001 में बस्ती के एक कारोबारी के बेटे राहुल मदेसिया का अपहरण और लड़के का मिलना अमरमणि के ही बंगले से इसने साबित कर दिया कि मंत्री का बंगला भी सुरक्षित ठिकाना बन चुका था। दो साल बाद हत्या का मामला और फिर उम्रकैद। अमरमणि को जिसने बनाया उसी सिस्टम ने गिराया।

उनका पतन यह साबित करता है किजब अपराध राजनीति बन जाए तो उसका अंत अपराध की अदालत में ही होता है।करीब 20 साल जेल में रहने के बाद2023 में अमरमणि और मधुमणि जेल से बाहर आए। लेकिन सवाल आज भी खड़ा है क्या पूर्वांचल की राजनीति सच में बदल गई है?या सिर्फ चेहरे बदले हैं?अगर आज योगी सरकार माफिया पर वार कर रही है —तो वह सिर्फ अपराधियों पर नहीं, उस पूरी राजनीति पर वार है जो अमरमणि जैसे लोगों को पैदा करती थी।

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