मध्य प्रदेश का धार आमतौर पर एक शांत और ऐतिहासिक शहर माना जाता है, लेकिन जब बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ती है, तो भोजशाला को लेकर देशभर का ध्यान यहां चला आता है। वजह है इस परिसर का दोहरा धार्मिक इस्तेमाल—हिंदू इसे देवी सरस्वती का पूजा स्थल मानते हैं, जबकि मुसलमान इसे शुक्रवार की नमाज के लिए इस्तेमाल करते हैं। इसी को लेकर यह विवाद पिछले 100 साल से ज्यादा समय से चला आ रहा है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह विवाद कैसे शुरू हुआ और मस्जिद किसने बनवाई।
इस्लामी शासन से पहले कैसी थी भोजशाला
इतिहासकारों के अनुसार, 11वीं सदी में राजा भोज के समय भोजशाला एक बड़ा शैक्षिक और धार्मिक केंद्र थी। माना जाता है कि यहां संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी और यह देवी सरस्वती से जुड़ा स्थान था। बाद में मिले संस्कृत शिलालेख हिंदू पक्ष के दावों का आधार बने।
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अलाउद्दीन खिलजी का हमला
करीब 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने धार पर हमला किया। इस दौरान भोजशाला की पुरानी संरचनाओं को नुकसान पहुंचा। हालांकि उस समय इसे पूरी तरह मस्जिद में नहीं बदला गया, लेकिन यहीं से इस स्थल के स्वरूप में बदलाव की शुरुआत मानी जाती है।
दिलावर खान ने कराया पहला बदलाव
1401 ईस्वी में मालवा सल्तनत के संस्थापक दिलावर खान घोरी ने भोजशाला के एक हिस्से को मस्जिद में बदलवाया। यह इस परिसर में पहला औपचारिक इस्लामी उपयोग माना जाता है। फिर भी, पुराने शिलालेख और संरचनाओं के अवशेष वहां मौजूद रहे।
महमूद शाह खिलजी द्वितीय और कमाल मौलाना मस्जिद
सबसे बड़ा निर्माण 1514 ईस्वी में महमूद शाह खिलजी द्वितीय के समय हुआ। उन्होंने यहां मस्जिद बनवाई और सूफी संत कमाल मौलाना का मकबरा भी बनवाया। यही संरचना आगे चलकर कमाल मौलाना मस्जिद के नाम से जानी गई, जहां आज भी शुक्रवार की नमाज होती है।
संस्कृत शिलालेख और विवाद की शुरुआत
भोजशाला को लेकर विवाद की शुरुआत 1902-03 में हुई, जब ब्रिटिश अधिकारी के. के. लेले ने मस्जिद की दीवारों और फर्श पर संस्कृत श्लोक खोजे। इससे यह दावा मजबूत हुआ कि यह स्थल पहले सरस्वती मंदिर या शिक्षा केंद्र रहा होगा।
1930 के दशक में बढ़ा तनाव
1935 में हिंदुओं ने सरस्वती पूजा की अनुमति मांगी, जबकि मुसलमानों ने नमाज पढ़ने का अधिकार जताया। 1937 में प्रशासन ने मस्जिद के भीतर नमाज की अनुमति दे दी, जिससे विवाद और गहरा गया।
आज की स्थिति क्या है
तनाव कम करने के लिए 7 अप्रैल 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने व्यवस्था तय की। इसके तहत
- हिंदू मंगलवार को पूजा कर सकते हैं
- मुसलमान शुक्रवार को नमाज पढ़ सकते हैं
यह व्यवस्था आज भी लागू है। इसी कारण जब बसंत पंचमी और शुक्रवार एक साथ पड़ते हैं, तो भोजशाला का मुद्दा फिर से चर्चा में आ जाता है।





