देश इस वक्त सिर्फ़ सड़कों पर नहीं, बल्कि सियासी धैर्य की आख़िरी सीमा पर खड़ा है। UGC को लेकर मचा घमासान अब महज़ छात्रों या विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहा—यह लड़ाई अब आर-पार की हो चुकी है।
जनरल कैटेगरी के लोग खुलकर सड़कों पर हैं, सोशल मीडिया पर आग लगी है और अब मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है। साफ़ चेतावनी दी जा रही है—अगर UGC के इस कथित काले कानून को वापस नहीं लिया गया, तो सवर्ण समाज देशव्यापी आंदोलन छेड़ देगा। इसी बीच सियासी हलकों में हलचल तब तेज़ हो गई, जब चर्चाएँ उभरीं कि राहुल राजा भैया भी इस मुद्दे पर सड़क से लेकर सदन तक आवाज़ उठाने की तैयारी में हैं।
वहीं भाजपा के विधान परिषद सदस्य देवेन्द्र प्रताप सिंह ने UGC को सीधी और सख़्त चिट्ठी लिखकर इन नियमों को देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए विनाशकारी बताया। उनका साफ़ कहना है—ये नियम न सिर्फ़ विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक माहौल तोड़ देंगे, बल्कि समाज में जातीय संघर्ष की चिंगारी भी बन सकते हैं। लेकिन इस पूरे बवाल में सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक सवाल कहीं और से उठ रहा है—जिन नेताओं को सवर्ण समाज ने वोट देकर संसद और सत्ता तक पहुँचाया, वे सब आज चुप क्यों हैं? राजनाथ सिंह हों या योगी आदित्यनाथ, बृजभूषण शरण सिंह हों या सुधांशु त्रिवेदी, नितिन गडकरी हों या पार्टी का कोई बड़ा चेहरा—UGC पर न बयान, न विरोध, न पक्ष… सिर्फ़ चुप्पी।
यही चुप्पी आज जनरल कैटेगरी के गुस्से को आग में घी डाल रही है। सवर्ण समाज खुलकर कह रहा है—अगर ये मुद्दा आरक्षण से जुड़ा होता, तो सड़क से सदन तक तूफान खड़ा हो चुका होता। लेकिन जब सवाल हमारे बच्चों के भविष्य का है, तो हमारे अपने नेता कुर्सी बचाने में व्यस्त हैं।और अब चेतावनी भी साफ़ है—2027 और 2029 में भारतीय जनता पार्टी को बताया जाएगा कि सामान्य वर्ग की राजनीतिक हैसियत क्या है। ये सिर्फ़ गुस्सा नहीं, ये सियासी अल्टीमेटम है।





