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रावण को मिली खुली धमकी ! बाराबंकी में तोड़ डालेंगे पैर ! ठाकुर नेता के ऐलान पर मचा बवाल

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में 15 मार्च की तारीख अब साधारण नहीं रह गई है। बाराबंकी की धरती पर एक ऐसा सियासी टकराव आकार ले रहा है जिसने दलित राजनीति, हिंदुत्व की राजनीति और बहुजन नेतृत्व—तीनों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। एक तरफ नगीना से सांसद और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ हैं, जो बाराबंकी में बड़ी रैली करने जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ करणी सेना के नेता अभिनव सिंह ने खुली चेतावनी दे दी है कि “अगर रावण बाराबंकी आया तो अपने पैरों से आएगा लेकिन अपने पैरों से वापस नहीं जाएगा।”यह बयान सामने आते ही सियासी पारा चढ़ गया है। प्रशासन सतर्क हो गया है, समर्थक आमने-सामने हैं और पूरे प्रदेश की निगाहें अब 15 मार्च पर टिक गई हैं।

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सवाल यह है कि क्या बाराबंकी की धरती पर राजनीतिक ताकत का खुला प्रदर्शन होगा या फिर यह टकराव किसी बड़े विवाद में बदल सकता है? उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट हमेशा से सत्ता की कुंजी माना जाता रहा है। लंबे समय तक यह वोट बैंक लगभग पूरी तरह बहुजन समाज पार्टी और मायावती के साथ खड़ा रहा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस समीकरण में बदलाव दिखाई देने लगा है। इसी बदलाव के केंद्र में हैं भीम आर्मी के संस्थापक और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद। युवा दलितों के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है और यही वजह है कि अब वह सिर्फ सामाजिक आंदोलन तक सीमित नहीं रहना चाहते बल्कि सक्रिय राजनीति में अपना मजबूत आधार बनाना चाहते हैं। 15 मार्च को चंद्रशेखर आजाद बाराबंकी में एक बड़ी जनसभा करने जा रहे हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि यह रैली न्याय, समानता और संविधान के मूल्यों को मजबूत करने के लिए आयोजित की जा रही है। इसके लिए भीम आर्मी के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर लोगों को आमंत्रित कर रहे हैं, दलित और पिछड़े समाज के घरों में पंपलेट बांटे जा रहे हैं और भारी भीड़ जुटाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इसी बीच इस रैली ने एक बड़ा राजनीतिक मोड़ ले लिया है। करणी सेना के नेता अभिनव सिंह ने चंद्रशेखर आजाद पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि वह हिंदू समाज को बांटने की कोशिश करते हैं और अगर वह बाराबंकी आए तो उन्हें मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। उनका बयान— “बाराबंकी राम की धरती है… अगर रावण यहां आया तो अपने पैरों से आएगा लेकिन अपने पैरों से वापस नहीं जाएगा।” यह बयान सामने आते ही राजनीतिक माहौल और ज्यादा गर्म हो गया। प्रशासन ने भी इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सतर्कता बरतने की तैयारी शुरू कर दी है। करणी सेना की चेतावनी के बाद भीम आर्मी भी पीछे हटने के मूड में नहीं है।

संगठन के कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी में इतनी ताकत नहीं है कि चंद्रशेखर आजाद को बाराबंकी आने से रोक सके। उनका दावा है कि 15 मार्च की रैली ऐतिहासिक होगी और हजारों की संख्या में लोग वहां पहुंचेंगे। इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ करणी सेना बनाम चंद्रशेखर के टकराव के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसके पीछे एक और बड़ा राजनीतिक समीकरण छिपा हुआ है। दरअसल 15 मार्च को ही लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती भी कांशीराम जयंती के अवसर पर एक विशाल रैली करने जा रही हैं।मायावती ने पहले ही पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दे दिए हैं कि इस रैली को शक्ति प्रदर्शन में बदलना है। पिछले कार्यक्रमों में उमड़ी भारी भीड़ के बाद बसपा कार्यकर्ताओं में भी उत्साह है और दलित समाज में यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि बहनजी फिर से सक्रिय हैं और 2027 की तैयारी कर रही हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असली लड़ाई दलित वोट बैंक की है।अगर दलित वोट दो हिस्सों में बंटता है तो इसका सीधा नुकसान बसपा को भी हो सकता है और चंद्रशेखर आजाद को भी। यही वजह है कि दोनों नेता अपने-अपने तरीके से शक्ति प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं।एक तरफ मायावती का लखनऊ कार्यक्रम है, दूसरी तरफ बाराबंकी में चंद्रशेखर आजाद की रैली—और दोनों का मकसद है यह दिखाना कि दलित समाज किसके साथ खड़ा है। करणी सेना की चेतावनी और भीम आर्मी की आक्रामक प्रतिक्रिया के बाद प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था बनाए रखने की है।संभावना जताई जा रही है कि 15 मार्च को बाराबंकी और लखनऊ दोनों जगह भारी पुलिस बल तैनात किया जाएगा ताकि किसी भी तरह की झड़प या तनाव को रोका जा सके। अब इस पूरी खबर का निष्कर्ष क्या है तो वो भी आप जान लीजिये ,,15 मार्च सिर्फ एक रैली की तारीख नहीं रह गई है। यह दिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीन अलग-अलग ताकतों की परीक्षा बन गया है—करणी सेना बनाम भीम आर्मी का टकराव,,,मायावती बनाम चंद्रशेखर की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा,और दलित वोट बैंक की असली दिशा,,अब सबकी नजरें उसी दिन पर टिकी हैं कि बाराबंकी की धरती पर आखिर क्या होने वाला है—राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन, सियासी संदेश या फिर एक नया विवाद।

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