उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस वक्त एक बड़ा खेल चल रहा है… एक तरफ साजिशों का जाल बिछाया जा रहा था… रणनीतियां तैयार हो रही थीं और कोशिश यह थी कि किसी भी तरह योगी आदित्यनाथ को राजनीतिक तौर पर घेरा जाए,उन्हें अपनी ही पार्टी और संगठन में कमजोर दिखाया जाए… लेकिन भगवाधारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐसा पलटवार किया है कि विरोधियों की पूरी रणनीति धरी की धरी रह गई है। जिन लोगों को लग रहा था कि बीजेपी में सरकार और संगठन के बीच खाई बढ़ रही है… कार्यकर्ता नाराज हैं… और इसका नुकसान योगी को होगा… अब वही योगी एक-एक चाल से पूरी तस्वीर बदलते नजर आ रहे हैं।
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बीते कुछ महीनों में लगातार यह चर्चा थी कि बीजेपी के कई कार्यकर्ता और कुछ नेता योगी सरकार से खुश नहीं हैं। आरोप लगे कि प्रशासन हावी हो गया है… पुलिस का दबदबा बढ़ गया है… और जमीनी कार्यकर्ताओं की सुनवाई कम हो रही है। यहां तक कि कई जगहों पर बीजेपी विधायक और सांसदों को अपने ही कार्यकर्ताओं की समस्याओं को लेकर धरने तक देने पड़े। विपक्ष ने तो इसे मुद्दा बना लिया और योगी पर “ठाकुरवाद” का नैरेटिव भी खड़ा करने की कोशिश की। कहा गया कि सरकार में संतुलन नहीं है… संगठन को महत्व नहीं दिया जा रहा… और यही बात 2027 के चुनाव में बीजेपी के लिए मुश्किल बन सकती है। लेकिन अब जो घटनाक्रम सामने आ रहा है… उसने पूरी कहानी को नया मोड़ दे दिया है। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले एक महीने में पांच अलग-अलग स्थानों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS के कार्यक्रमों और बैठकों में हिस्सा लिया। यह अपने आप में बड़ा संकेत माना जा रहा है क्योंकि आमतौर पर मुख्यमंत्री इस तरह लगातार संघ की बैठकों में इतनी सक्रियता नहीं दिखाते। इन बैठकों में सिर्फ औपचारिक बातें नहीं हुईं बल्कि संघ के स्वयंसेवकों ने सीधे और तीखे सवाल भी पूछे। संगठन और सरकार के तालमेल से लेकर कार्यकर्ताओं की नाराजगी… विकास कार्यों की गति… जातीय समीकरण… और जमीनी फीडबैक तक हर मुद्दे पर खुलकर चर्चा हुई। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह दिखाता है कि अब RSS सरकार और संगठन के कामकाज पर और ज्यादा सक्रिय निगरानी रख रहा है… और साथ ही योगी आदित्यनाथ को भी मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहा है। सूत्रों की मानें तो RSS का फोकस साफ है… अगर योगी आदित्यनाथ 2027 का चुनाव अपने नेतृत्व में बीजेपी को जिताने में सफल रहते हैं तो उनका कद राष्ट्रीय राजनीति में और बढ़ सकता है। और यही वजह है कि संगठन चाहता है कि राज्य में कोई कमजोरी ना रह जाए।

यानी साफ संदेश – पहले उत्तर प्रदेश मजबूत… फिर दिल्ली का रास्ता। कहा तो यह भी जा रहा है कि RSS के सुझावों के बाद ही योगी आदित्यनाथ ने संगठन के नेताओं के साथ ज्यादा तालमेल बढ़ाना शुरू किया है और कई पुराने मतभेद भी खत्म करने की कोशिश की गई है। पंकज चौधरी जैसे नेताओं के साथ बेहतर समन्वय भी उसी रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है। इसी कड़ी में अब एक नई प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था लागू की गई है… जिसे योगी का मास्टरस्ट्रोक बताया जा रहा है। नई व्यवस्था के तहत अब हर जिले में एक समन्वय समिति बनाई जाएगी। इस समिति की अध्यक्षता जिले के प्रभारी मंत्री करेंगे और इसमें जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और बीजेपी के जिलाध्यक्ष भी शामिल होंगे। यानी अब प्रशासन, पुलिस और संगठन – तीनों एक ही टेबल पर बैठेंगे।निर्देश दिए गए हैं कि यह बैठक हर महीने अनिवार्य रूप से होगी और इसमें जिले की प्रमुख समस्याओं और विकास कार्यों की समीक्षा की जाएगी। इससे कार्यकर्ताओं की शिकायतें सीधे प्रशासन तक पहुंचेंगी और अधिकारियों को भी जवाबदेह बनाया जाएगा। सरकार ने 2026 के लिए अधिकारियों की एक नई गोपनीय कार्य मार्गदर्शिका भी जारी की है जिसमें साफ निर्देश हैं कि जनता से जुड़ी समस्याओं को तय समय सीमा में निपटाना होगा। जैसे:स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, स्थानीय विवाद, थाना और तहसील से जुड़ी शिकायतें – 7 दिन में।और जिन मामलों में बजट या तकनीकी स्वीकृति चाहिए – 15 दिन में कार्रवाई अनिवार्य।हर मामले में कार्यकर्ताओं को महत्व दिया जायेगा ,,,,यानी अब फाइलें महीनों तक दबाकर रखने का खेल मुश्किल होने वाला है। इतना ही नहीं… हर बैठक का पूरा रिपोर्ट सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय भेजा जाएगा ताकि लखनऊ से निगरानी हो सके कि जमीन पर क्या हो रहा है और कौन अधिकारी काम कर रहा है और कौन सिर्फ कुर्सी गर्म कर रहा है। दरअसल यह व्यवस्था इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि पिछले कुछ सालों में बीजेपी के अंदर से ही आवाज उठती रही कि कार्यकर्ताओं की सुनवाई नहीं हो रही। कई बार तो स्थिति इतनी असहज हो गई कि पार्टी के जनप्रतिनिधियों को ही प्रदर्शन करना पड़ा। अब इस नई व्यवस्था से योगी ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है –कार्यकर्ताओं को महत्व देना…अधिकारियों की जवाबदेही तय करना… और संगठन को साथ लेकर चलने का संदेश देना। लेकिन जैसे ही यह फैसला आया… सियासत भी गरमा गई। समाजवादी पार्टी ने इस पर तीखा हमला बोला। सपा प्रवक्ता अमीक जामेई ने कहा कि उत्तर प्रदेश पहले ही पुलिस स्टेट बन चुका है और अब बीजेपी पदाधिकारियों को प्रशासनिक बैठकों में शामिल करने से पुलिस और बेलगाम हो जाएगी। वहीं बीजेपी ने पलटवार करने में देर नहीं लगाई। बीजेपी नेता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि सपा के समय पुलिस का इस्तेमाल अलग कामों में होता था… लेकिन अब बीजेपी सरकार में पुलिस और प्रशासन का फोकस जनता की समस्याओं को हल करना है। उन्होंने कहा कि सरकार और संगठन मिलकर काम करेंगे ताकि योजनाओं का लाभ सीधे जनता तक पहुंचे। यानी साफ है… योगी का यह फैसला सिर्फ प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी है। संदेश यह कि योगी अकेले नहीं हैं… संगठन उनके साथ है। संदेश यह कि कार्यकर्ता नाराज नहीं… बल्कि अब उन्हें सीधे सिस्टम से जोड़ा जाएगा। और संदेश यह भी कि 2027 की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है। अब बड़ा सवाल यही है –क्या योगी का यह नया मॉडल बीजेपी को और मजबूत करेगा? क्या इससे कार्यकर्ताओं की नाराजगी खत्म होगी? और क्या यही रणनीति योगी को राष्ट्रीय राजनीति में और बड़ा चेहरा बना सकती है? यह तो आने वाला वक्त बताएगा…लेकिन इतना जरूर है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि उन्हें राजनीतिक चालों का जवाब देना भी आता है… और समय आने पर पूरा गेम पलटना भी। आप क्या सोचते हैं? क्या योगी का यह फैसला सही है या विपक्ष की आशंकाएं सही हैं?


