क्या भारतीय जनता पार्टी के अंदर सब कुछ ठीक चल रहा है या फिर अंदर ही अंदर एक ऐसी सियासी जंग शुरू हो चुकी है जिसकी गूंज 2027 ही नहीं बल्कि 2029 और उसके बाद की राजनीति तक सुनाई दे सकती है? क्या योगी आदित्यनाथ की बढ़ती लोकप्रियता ने दिल्ली के पावर सेंटर को असहज कर दिया है? क्या यूपी में सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर योगी के प्रभाव को सीमित करने की रणनीति बनाई जा रही है? और क्या भाजपा के अंदर ही भविष्य के नेतृत्व को लेकर खामोश खींचतान शुरू हो चुकी है? राजनीतिक गलियारों में उठ रही चर्चाओं को अगर जोड़ा जाए तो एक बड़ा नैरेटिव बनता है – दिल्ली का केंद्रीय नेतृत्व बनाम योगी आदित्यनाथ का उभार।
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2017 में जब योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया था तब बहुत लोगों को यह एक प्रयोग लगा था, लेकिन आज 9 साल बाद योगी भाजपा के सबसे मजबूत और पहचान वाले चेहरों में शामिल हो चुके हैं। उनकी पहचान बनी: सख्त कानून व्यवस्था,,बुलडोजर कार्रवाई,,स्पष्ट हिंदुत्व छवि,,तेज प्रशासनिक फैसले,,और सबसे बड़ी बात – उनकी अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक ब्रांडिंग बन गई जो बहुत कम मुख्यमंत्रियों को मिलती है। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि योगी अब सिर्फ यूपी के नेता नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के संभावित चेहरों में गिने जाने लगे हैं। क्या दिल्ली योगी की पावर को बैलेंस कर रही है? क्योंकि बीते कुछ महीनों में भाजपा की राजनीति में एक चीज साफ दिखाई देती है – ओबीसी नेतृत्व को लगातार आगे लाया जा रहा है। अमित शाह की स्वतंत्र देव सिंह से मुलाकात रामचंद्र यादव से संवाद साध्वी निरंजन ज्योति को बड़ी जिम्मेदारी वरुण गांधी से मोदी की मुलाकात,,,इन सबको कुछ लोग सिर्फ संगठनात्मक गतिविधि मानते हैं लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे सोशल इंजीनियरिंग का बड़ा प्रयोग भी मान रहे हैं। एक धारणा यह भी है कि भाजपा अब यूपी में जातीय संतुलन का नया मॉडल बना रही है जिसमें किसी एक सामाजिक वर्ग की निर्भरता कम हो। लेकिन राजनीतिक चर्चा का दूसरा पक्ष कहता है कि यह योगी और ठाकुर नेतृत्व के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश भी हो सकती है। अब सवाल उठता है आखिर पंकज चौधरी जब से यूपी में प्रदेश अध्यक्ष बने है तब से क्या कुछ बीजेपी में बदला है ,,,तो इसका जवाब है ,,राजनीतिक सूत्रों के अनुसार जब से पंकज चौधरी की संगठन में भूमिका मजबूत हुई है तब से संगठन की पकड़ चुनावी तैयारी में और मजबूत दिखाई दे रही है। चर्चा है कि: 2027 के प्रत्याशियों की सूची पर काम शुरू जिला स्तर पर संगठन की पकड़ मजबूत अधिकारियों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव सरकार से ज्यादा संगठन की सक्रियता,,कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि भविष्य में अगर कैबिनेट विस्तार होता है तो उसमें दिल्ली और संगठन की भूमिका निर्णायक हो सकती है। हालांकि यह सब सियासी चर्चाएं हैं, आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जाता है कि भाजपा के कुछ सीनियर नेता योगी के प्रशासनिक मॉडल को पसंद करते हैं। जिन नामों की चर्चा होती है उनमें राजनाथ सिंह,नितिन गडकरी,,शिवराज सिंह चौहान,,वसुंधरा राजे,,जैसे नेताओं का नाम लिया जाता है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह नेता संगठनात्मक संतुलन की राजनीति के समर्थक हैं और मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व को भाजपा की ताकत मानते हैं।इन सब के बीच अगर भाजपा की राजनीति की बात हो और RSS का जिक्र न हो यह संभव नहीं। योगी की संघ पदाधिकारियों के साथ बैठकों को लेकर भी चर्चाएं होती रही हैं। कुछ लोग इसे सामान्य संवाद बताते हैं लेकिन कुछ विश्लेषक इसे योगी की वैचारिक मजबूती का संकेत मानते हैं। अगर संघ का झुकाव किसी नेता की तरफ माना जाता है तो उसका राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है। यही वजह है कि RSS को इस पूरे समीकरण का साइलेंट फैक्टर माना जा रहा है।

हाल के दिनों में चंद्रशेखर आजाद और कुछ अन्य संगठनों की बयानबाजी के बाद जातीय बहस तेज हुई। योगी का बयान कि हिंदुओं को जातियों में बांटना खतरनाक है, उसे भी इसी संदर्भ में देखा गया। इसके बाद सोशल मीडिया पर यह नैरेटिव भी चला कि भाजपा की पारंपरिक हिंदुत्व एकता की राजनीति अब सोशल इंजीनियरिंग की तरफ जा रही है। हालांकि भाजपा का आधिकारिक रुख हमेशा सामाजिक संतुलन का रहा है। क्या यह भविष्य की प्रधानमंत्री राजनीति की भूमिका है? सबसे दिलचस्प राजनीतिक चर्चा यही है। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि: यह लड़ाई सिर्फ 2027 की नहीं ,सिर्फ 2029 की नहीं बल्कि भाजपा के अगले नेतृत्व की भी हो सकती है। क्योंकि भाजपा में जिस नेता का बड़ा जनाधार होता है वह भविष्य की राजनीति में स्वतः महत्वपूर्ण हो जाता है। हालांकि भाजपा में नेतृत्व का फैसला सामूहिक प्रक्रिया से होता है। अब इस पूरी खबर का निष्कर्ष क्या है तो वो भी आप जान लीजिये ,,सार्वजनिक तौर पर भाजपा पूरी तरह एकजुट दिखाई देती है। कोई नेता खुलकर कुछ नहीं कह रहा। कोई आधिकारिक विवाद सामने नहीं। लेकिन राजनीतिक विश्लेषण संकेतों से ही होता है। और संकेत क्या कह रहे हैं? दिल्ली रणनीति बना रही है ,,योगी अपनी लोकप्रियता बनाए हुए हैं,,संगठन अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है ,,RSS संवाद में है,,यानी सियासी शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। अब सबसे बड़ा सवाल क्या योगी 2027 के बाद और मजबूत होंगे? क्या भाजपा यूपी में नया प्रयोग करेगी? या फिर सब कुछ सिर्फ राजनीतिक अटकलें हैं? जवाब समय देगा… लेकिन इतना तय है— अगर यह सिर्फ चर्चा भी है तो भी यह बताती है कि योगी अब भाजपा की राजनीति में एक बहुत बड़ा फैक्टर बन चुके हैं।






