देशवासियों… अपनी कुर्सी की पेटी बांध लीजिए, क्योंकि हालात कुछ वैसे ही बनते नजर आ रहे हैं जैसे कोरोना के समय बने थे। सड़कों पर बढ़ती भीड़, रेलवे स्टेशनों पर उमड़ता जनसैलाब, पेट्रोल पंपों पर लंबी-लंबी कतारें और गैस एजेंसियों के बाहर सिलेंडर के लिए घंटों इंतजार करते लोग… ये तस्वीरें कई बड़े सवाल खड़े कर रही हैं। एक तरफ सरकार बार-बार कह रही है कि देश में पेट्रोल, डीजल और LPG की कोई कमी नहीं है, सब कुछ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है… लेकिन दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और कहानी बयान कर रही है। गुजरात, सूरत, मुंबई और दूसरे औद्योगिक शहरों से हजारों मजदूर अपने गांवों की तरफ लौट रहे हैं। आखिर ऐसा डर किस बात का है? क्या यह सिर्फ अफवाह है… या फिर कोई ऐसा संकट जिसकी आहट आम आदमी तक पहुंच चुकी है?
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एक्सपर्ट्स का कहना है कि शहरों में काम करने वाले गरीब मजदूर अक्सर छोटी मात्रा में महंगी गैस खरीदकर किसी तरह खाना बनाते थे, लेकिन जैसे ही सप्लाई चेन प्रभावित हुई और ब्लैक में मिलने वाली गैस बंद हुई, उनके सामने रोटी का संकट खड़ा हो गया। सोचिए… जब रोज कमाने खाने वाला इंसान अपने परिवार का पेट नहीं भर पाएगा, तो वह क्या करेगा? वह मजबूर होकर शहर छोड़ेगा… अपने गांव लौटेगा… चाहे वहां रोजगार हो या ना हो।यही वजह है कि अचानक हो रहा यह पलायन सिर्फ एक सामाजिक समस्या नहीं बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरे की घंटी माना जा रहा है। क्योंकि जिन मजदूरों के दम पर फैक्ट्रियां चलती हैं, अगर वही शहर छोड़ देंगे तो उद्योगों पर भी असर पड़ना तय है। इसी बीच विपक्ष भी मोदी सरकार पर हमलावर हो गया है। आम आदमी पार्टी से लेकर अखिलेश यादव और राहुल गांधी तक सवाल पूछ रहे हैं कि अगर सब कुछ ठीक है तो फिर देश में यह बेचैनी क्यों है?अखिलेश यादव ने तो यहां तक कह दिया कि भाजपा ने जनता को सिर्फ लाइनों में खड़ा करने का काम किया है – कभी नोटबंदी में, कभी कोरोना में और अब ऊर्जा संकट की आशंका में। अब सबसे बड़ा सवाल यही है… क्या देश में सच में सब कुछ सामान्य है? क्या सरकार पूरी सच्चाई जनता को बताएगी? या फिर आम आदमी को इसी तरह डर और अनिश्चितता के माहौल में जीना पड़ेगा? देश इंतजार कर रहा है जवाब का… और जनता जानना चाहती है सच्चाई






