Allahabad High Court ने एक अहम फैसले में कहा है कि मुस्लिम (मोहम्मदिया) कानून के तहत तलाक उसी दिन से प्रभावी माना जाएगा, जिस दिन पति तलाक का ऐलान करता है। कोर्ट ने साफ किया कि बाद में अदालत द्वारा दिया गया आदेश सिर्फ इस बात की पुष्टि करता है, वह कोई नया तलाक नहीं बनाता।
यह फैसला जस्टिस Madan Pal Singh की सिंगल बेंच ने हुमायरा रियाज की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि तलाक की असली तारीख वही होगी, जब उसका ऐलान किया गया था, न कि जब अदालत ने उसे मान्यता दी।दरअसल, यह मामला प्रयागराज के परिवार न्यायालय के एक फैसले से जुड़ा था। परिवार न्यायालय ने महिला की भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की मांग को खारिज कर दिया था। यह मामला Section 125 CrPC के तहत दायर किया गया था। हालांकि, अदालत ने महिला के दो नाबालिग बेटों के लिए भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।
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परिवार न्यायालय ने महिला की याचिका इस आधार पर खारिज की थी कि जब उसने दूसरी शादी की, उस समय उसकी पहली शादी कानूनी रूप से खत्म नहीं हुई थी। इसलिए दूसरी शादी को अमान्य माना गया था।
महिला की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि उसके पहले पति ने 27 फरवरी 2005 को ही तलाक का ऐलान कर दिया था। बाद में इस तलाक को मान्यता देने के लिए अदालत में मामला दायर किया गया और 8 जनवरी 2013 को कोर्ट ने इस तलाक को वैध घोषित कर दिया।
महिला के वकील ने कहा कि तलाक के बाद ‘इद्दत’ की अवधि पूरी करने के बाद उसने मई 2012 में दूसरी शादी की थी। उन्होंने यह भी बताया कि दूसरे पति को पहले तलाक के बारे में पूरी जानकारी थी। इसलिए सिर्फ तकनीकी आधार पर महिला को भरण-पोषण से वंचित करना गलत है, खासकर जब दोनों पति-पत्नी की तरह साथ रह चुके हों।
वहीं, पति की ओर से यह दलील दी गई कि महिला ने पहली शादी खत्म हुए बिना ही दूसरी शादी कर ली थी। उनका कहना था कि तलाक का कानूनी आदेश 2013 में आया, इसलिए 2012 में हुई दूसरी शादी मान्य नहीं मानी जा सकती।
हालांकि, Allahabad High Court ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर पति तलाक का ऐलान कर देता है और बाद में अदालत से उसकी पुष्टि कराता है, तो अदालत का आदेश सिर्फ उस पहले से हुए तलाक की पुष्टि करता है, कोई नया तलाक नहीं बनाता।इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि मुस्लिम कानून में तलाक की वैधता उसकी घोषणा की तारीख से ही मानी जाएगी। अदालत का आदेश सिर्फ उस स्थिति को स्पष्ट करने के लिए होता है।
कुल मिलाकर, यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां तलाक की तारीख और उसकी कानूनी मान्यता को लेकर विवाद होता है। इससे ऐसे मामलों में स्पष्टता आएगी और कई महिलाओं को न्याय मिलने में मदद मिल सकती है।






