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सपा में बढ़ी अंदरूनी खींचतान, रामपुर और मुरादाबाद सांसदों के बीच खुलकर आया विवाद

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समाजवादी पार्टी के भीतर इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी के दो सांसदों के बीच मतभेद अब खुलकर सामने आ गए हैं और सोशल मीडिया तक पहुंच गए हैं। रामपुर के सांसद मोहिबुल्ला नदवी और मुरादाबाद की सांसद रुचि वीरा के बीच यह विवाद चर्चा का विषय बन गया है।

कैसे शुरू हुआ विवाद?

यह पूरा मामला संसद में उठी एक मांग से शुरू हुआ। मोहिबुल्ला नदवी ने लोकसभा में रामपुर में एम्स (AIIMS) खोलने की मांग रखी। उन्होंने अपने बयान में यह भी कहा कि इस मांग को मुरादाबाद की सांसद रुचि वीरा और संभल के सांसद जियाउर रहमान बर्क का भी समर्थन प्राप्त है।दिलचस्प बात यह रही कि जब नदवी यह बात कह रहे थे, उस समय रुचि वीरा उनके ठीक बगल में बैठी थीं। लेकिन बाद में इस बयान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया।

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रुचि वीरा ने किया कड़ा खंडन

संसद में दिए गए इस बयान के बाद रुचि वीरा ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने साफ कहा कि उनसे इस मुद्दे पर न तो कोई बात की गई और न ही उनकी कोई सहमति ली गई थी। उन्होंने नदवी के दावे को पूरी तरह गलत और बेबुनियाद बताया।

रुचि वीरा ने यह भी कहा कि वह खुद मुरादाबाद में एम्स खोलने की मांग पहले ही संसद में उठा चुकी हैं और इस दिशा में काम कर रही हैं। ऐसे में उनकी सहमति का गलत तरीके से जिक्र करना सही नहीं है। उन्होंने इस पूरे मामले को ‘ओछी राजनीति’ का हिस्सा भी बताया।

अंदरूनी गुटबाजी की चर्चा तेज

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विवाद सिर्फ एम्स की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे पार्टी के अंदर की गुटबाजी भी एक बड़ा कारण हो सकती है। कहा जा रहा है कि मोहिबुल्ला नदवी को अखिलेश यादव की पसंद माना जाता है।

वहीं दूसरी ओर, सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान और उनके समर्थक इस फैसले से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। माना जाता है कि रुचि वीरा भी आजम खान के खेमे के करीब हैं।

इसी वजह से पार्टी के भीतर ‘आजम खान गुट’ और ‘अखिलेश यादव के करीबी नेताओं’ के बीच खींचतान की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। यह विवाद उसी दरार को और गहरा करता नजर आ रहा है।

चुनाव से पहले बढ़ी चिंता

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे करीब आ रहे हैं। ऐसे समय में पार्टी के भीतर इस तरह के मतभेद सामने आना सपा के लिए चिंता का विषय बन सकता है।

दो बड़े सांसदों के बीच इस तरह का सार्वजनिक विवाद पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े करता है। अगर इसी तरह अंदरूनी मतभेद बढ़ते रहे, तो इसका असर चुनावी प्रदर्शन पर भी पड़ सकता है।

क्या पड़ेगा असर?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जनता के बीच पार्टी की छवि पर भी इसका असर पड़ सकता है। जब पार्टी के नेता ही एक-दूसरे के खिलाफ खुलकर बयान देने लगें, तो संगठन की मजबूती पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब देखना होगा कि पार्टी नेतृत्व इस विवाद को कैसे सुलझाता है और क्या आने वाले समय में सपा अपने अंदरूनी मतभेदों को दूर कर पाती है या नहीं।

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