उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर पुलिस एनकाउंटर और जातीय समीकरण को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav द्वारा यूपी पुलिस के एनकाउंटर पर जातिगत आंकड़े जारी किए जाने के बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। विपक्ष जहां पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठा रहा है, वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि कानून अपराध देखकर कार्रवाई करता है, जाति देखकर नहीं।
दरअसल, मंगलवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अखिलेश यादव ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में पुलिस एनकाउंटर के दौरान विशेष समुदायों और जातियों को अधिक निशाना बनाया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में मुसलमानों और कुछ खास जातियों के लोगों का सबसे ज्यादा एनकाउंटर हुआ है। समाजवादी पार्टी लंबे समय से यह मुद्दा उठाती रही है कि प्रदेश में पुलिस कार्रवाई निष्पक्ष नहीं है और जातिगत आधार पर कार्रवाई की जा रही है।
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अखिलेश यादव के इस बयान के बाद भाजपा और सरकार समर्थक नेताओं ने पलटवार करते हुए कहा कि एनकाउंटर में मारे गए लोग कोई निर्दोष नागरिक नहीं, बल्कि गंभीर अपराधों में शामिल अपराधी थे। सत्ता पक्ष का तर्क है कि अपराधी की पहचान उसकी जाति या धर्म से नहीं, बल्कि उसके अपराध से होनी चाहिए। इसी बहस के बीच राजनीतिक गलियारों में एक नई कहावत भी चर्चा में आ गई है — “जाति न देखो अपराधी की, देखो उसका अपराध।”
सरकार समर्थक नेताओं ने हाल के कई चर्चित एनकाउंटर मामलों का उदाहरण भी दिया। 25 मई को जौनपुर में पुलिस ने रवि यादव नामक आरोपी को मुठभेड़ में मार गिराया था। पुलिस के अनुसार उस पर बारात लेकर जा रहे दूल्हे की बीच सड़क गोली मारकर हत्या करने का आरोप था। इसी तरह अलीगढ़ में रजा मोहम्मद और मुबीन नाम के दो बदमाश पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक दोनों पर लूट और अन्य गंभीर अपराधों के 70 से ज्यादा मामले दर्ज थे और इलाके में उनका आतंक था।
गाजियाबाद में कैश वैन लूटकांड के आरोपी जुबैर का एनकाउंटर भी काफी चर्चा में रहा। पुलिस के अनुसार वह एक लाख रुपये का इनामी बदमाश था और लंबे समय से फरार चल रहा था। इन मामलों का हवाला देते हुए सरकार समर्थकों का कहना है कि पुलिस की कार्रवाई अपराधियों के खिलाफ है, न कि किसी जाति विशेष के खिलाफ।
सत्ता पक्ष यह भी तर्क दे रहा है कि सिर्फ मुस्लिम या ब्राह्मण समुदाय के लोगों के ही नहीं, बल्कि अन्य जातियों से जुड़े अपराधियों के खिलाफ भी पुलिस ने कार्रवाई की है। उदाहरण के तौर पर सुल्तानपुर ज्वेलरी लूटकांड के आरोपी मंगेश यादव और अनुज प्रताप सिंह के एनकाउंटर का जिक्र किया जा रहा है। इसके अलावा राजस्थान और यूपी में आतंक का पर्याय माने जाने वाले मुकेश ठाकुर को भी पुलिस ने मुठभेड़ में ढेर किया था। गाजियाबाद में अनिल दुजाना गैंग से जुड़े बलराम ठाकुर का एनकाउंटर भी इसी बहस का हिस्सा बना हुआ है।
हालांकि विपक्ष का कहना है कि एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और पुलिस कार्रवाई पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। वहीं सरकार लगातार दावा कर रही है कि प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति के तहत कार्रवाई की जा रही है।
उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था और एनकाउंटर की राजनीति लंबे समय से चुनावी मुद्दा रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि 2027 विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ यह बहस और ज्यादा तेज हो सकती है।






