लखनऊ। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीतियां तेज कर दी हैं। इसी कड़ी में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी संगठन को मजबूत करने और अपने पारंपरिक जनाधार को फिर से सक्रिय करने की दिशा में बड़े कदम उठाती नजर आ रही है। पार्टी सुप्रीमो मायावती ने संगठन के पुनर्गठन और प्रभावशाली नेताओं को पार्टी से जोड़ने की मुहिम शुरू कर दी है। इसके तहत पुराने नेताओं की ‘घर वापसी’ और नए सामाजिक समीकरणों को साधने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, मायावती ने पार्टी के सभी क्षेत्रीय कोऑर्डिनेटरों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव रखने वाले नेताओं से संपर्क करें। विशेष रूप से ऐसे नेताओं को पार्टी में शामिल करने की रणनीति बनाई जा रही है जो पहले बसपा का हिस्सा रह चुके हैं और जिनकी स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ है। बताया जा रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध और पूर्वांचल के कई पूर्व सांसद, विधायक और वरिष्ठ नेता बसपा के संपर्क में हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगामी कुछ महीनों में कई ऐसे नेता बसपा का दामन थाम सकते हैं, जिन्हें अपनी वर्तमान राजनीतिक पार्टी में भविष्य को लेकर असमंजस है। टिकट कटने की आशंका या संगठन में उपेक्षा महसूस कर रहे नेताओं को बसपा अपने साथ जोड़ने की कोशिश में है।
इसी बीच प्रदेश की राजनीति में बसपा और कांग्रेस के संभावित गठबंधन की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। हालांकि दोनों दलों की ओर से अब तक किसी प्रकार की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने राजनीतिक अटकलों को हवा दी है। बीते दिनों कांग्रेस के दलित नेताओं बाराबंकी सांसद तनुज पुनिया और अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम का मायावती के आवास पहुंचना चर्चा का विषय बना था। भले ही मायावती उनसे नहीं मिलीं, लेकिन इस मुलाकात ने संभावित राजनीतिक समीकरणों पर सवाल खड़े कर दिए।
बसपा की बढ़ती सक्रियता का असर अन्य विपक्षी दलों पर भी दिखाई दे रहा है। समाजवादी पार्टी जहां पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति पर काम कर रही है, वहीं बसपा भी दलित और मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मुस्लिम वोटों का विभाजन होता है तो इसका असर विपक्षी समीकरणों पर पड़ सकता है।
मायावती एक बार फिर वर्ष 2007 की सोशल इंजीनियरिंग रणनीति को नए रूप में लागू करने की तैयारी में हैं। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्रा को ब्राह्मण समाज, उमाशंकर सिंह को क्षत्रिय वर्ग और विश्वनाथ पाल को अति पिछड़े वर्गों के बीच संगठन विस्तार की जिम्मेदारी सौंपी है। इसके अलावा सभी जिलों में मुस्लिम भाईचारा समितियों के गठन का अभियान भी शुरू किया गया है।
कांग्रेस प्रवक्ता सचिन रावत ने इस विषय पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बसपा एक स्वतंत्र राजनीतिक दल है और उसके संगठनात्मक फैसले उसका आंतरिक विषय हैं। वहीं समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता दीपक रंजन का दावा है कि बसपा का पारंपरिक वोट बैंक धीरे-धीरे सपा के साथ जुड़ चुका है और आगामी चुनाव में विपक्षी दल अपने-अपने सामाजिक समीकरणों के आधार पर रणनीति बनाएंगे।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार चुनावी चुनौतियों का सामना कर रही बसपा के लिए यह समय निर्णायक साबित हो सकता है। ऐसे में संगठन को मजबूत करने, पुराने नेताओं को वापस लाने और नए सामाजिक गठजोड़ तैयार करने की कोशिशें पार्टी की भविष्य की रणनीति का अहम हिस्सा बनती दिखाई दे रही हैं। 2027 के चुनाव से पहले बसपा का यह सक्रिय अभियान प्रदेश की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दे सकता है।






