दिल्ली की कुर्सी पर बैठे सियासतदानों की आज जान हलक में आ गई है… सपने में भी नहीं सोचे होंगे हज़ारो लाखो काक्रोच युवा दिल्ली पहुंच कर सत्ता के नीव को ही हिला देंगे,,जो लोग ac के कमरे में बैठ कर ये सोच रहे है की इस प्रदर्शन से क्या ही कुछ हो जायेगा,,आज उनकी हवा टाइट हो गयी है ,,हाथों में संविधान की किताब, जय भीम के नारे, जंतर-मंतर के चारों तरफ कई लेयर की बैरिकेडिंग, भारी पुलिस बल और हजारों युवाओं की भीड़… दिल्ली में जो दृश्य देखने को मिला उसने राजनीतिक गलियारों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले प्रदर्शन हुआ, जिसके नेतृत्व में अभिजीत दीपके दिखाई दिए। सवाल सिर्फ एक प्रदर्शन का नहीं है, बल्कि यह है कि क्या भारत की राजनीति में युवाओं की नई बेचैनी किसी बड़े बदलाव का संकेत दे रही है? और क्या सोशल मीडिया के दौर में कोई नया राजनीतिक प्रयोग जन्म ले रहा है?
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जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ ने यह जरूर दिखाया कि युवाओं के भीतर रोजगार, भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर असंतोष मौजूद है। प्रदर्शन के दौरान संविधान और डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम को प्रमुखता से आगे रखा गया। यही कारण है कि इस आंदोलन को सिर्फ एक सामान्य विरोध प्रदर्शन के बजाय एक राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को निशाने पर लेते हुए भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और युवाओं की समस्याओं पर ध्यान न देने का आरोप लगाया। हालांकि इन आरोपों पर सरकार की तरफ से अलग-अलग मौकों पर जवाब भी दिए जाते रहे हैं और सरकार लगातार भर्ती प्रक्रियाओं तथा शिक्षा सुधारों को लेकर अपने प्रयासों का दावा करती रही है। लेकिन असली सवाल किसी एक संगठन या किसी एक नेता का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर युवाओं का यह गुस्सा किस दिशा में जाएगा? भारतीय राजनीति में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जब छात्र और युवा आंदोलन ने सत्ता की राजनीति को प्रभावित किया। 1974 में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए बड़ी चुनौती बन गया था। उसके बाद आपातकाल लगा और फिर सत्ता परिवर्तन हुआ। इसी तरह 2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने पूरे देश का ध्यान खींचा। उस आंदोलन ने न सिर्फ कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बनाया बल्कि आगे चलकर आम आदमी पार्टी जैसी नई राजनीतिक शक्ति के उदय का रास्ता भी तैयार किया। लेकिन हर आंदोलन सत्ता परिवर्तन में बदल जाए, ऐसा जरूरी नहीं होता। आंदोलन को राजनीतिक सफलता में बदलने के लिए संगठन, नेतृत्व, स्पष्ट विचारधारा और व्यापक जनाधार की आवश्यकता होती है।
सोशल मीडिया पर ट्रेंड होना और सड़कों पर भीड़ जुटाना एक बात है, लेकिन चुनावी राजनीति में उसे वोट में बदलना बिल्कुल अलग चुनौती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभिजीत दीपके और उनके सहयोगी जिस प्रकार संविधान, अंबेडकर और “जय भीम” जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे यह संकेत मिलता है कि वे सामाजिक न्याय और युवाओं के मुद्दों को केंद्र में रखकर एक अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि उनकी वास्तविक ताकत और प्रभाव का आकलन आने वाले समय में ही हो सकेगा। दूसरी तरफ भाजपा के सामने भी चुनौती केवल विपक्षी दलों की नहीं है, बल्कि युवाओं की अपेक्षाओं की है। पिछले कुछ वर्षों में बेरोजगारी, पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में देरी जैसे मुद्दों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में अगर इन मुद्दों पर असंतोष बढ़ता है तो यह किसी भी सरकार के लिए चिंता का विषय हो सकता है। हालांकि भारत की राजनीति नेपाल या बांग्लादेश जैसे देशों से अलग है। यहां लोकतांत्रिक संस्थाएं, चुनावी प्रक्रिया और राजनीतिक दलों की जड़ें काफी मजबूत हैं। इसलिए किसी भी आंदोलन के प्रभाव का आकलन समय के साथ ही किया जा सकता है। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि जंतर-मंतर पर उमड़ी भीड़ ने यह संदेश दिया है कि भारत का युवा सिर्फ धार्मिक और जातीय बहसों तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि रोजगार, शिक्षा और भविष्य से जुड़े सवालों पर भी अपनी आवाज बुलंद करना चाहता है। अब देखना यह होगा कि क्या यह आवाज कुछ दिनों की सुर्खियां बनकर रह जाती है, या फिर आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति में किसी नए अध्याय की शुरुआत करती है। क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब युवा सड़क पर उतरता है तो सियासत उसे नजरअंदाज नहीं कर पाती, लेकिन यह भी सच है कि हर आंदोलन इतिहास नहीं बनता। इतिहास वही बनता है जो जनभावनाओं को लंबे समय तक संगठित राजनीतिक शक्ति में बदल सके।






