व्यक्तिगत स्वतंत्रता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं, हाईकोर्ट का बड़ा संदेश
प्रयागराज: व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है, अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति को बिना कानूनी आधार के हिरासत में रखना संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और इसके लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जाएगा।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है या शांति भंग की आशंका के नाम पर कानून का दुरुपयोग कर जेल भेजा जाता है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी, इतना ही नहीं, पीड़ित को दिए जाने वाले मुआवजे की राशि दोषी अधिकारियों के वेतन से भी वसूली जा सकती है।
आठ दिन की अवैध हिरासत पर दो लाख रुपये मुआवजा
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि एक व्यक्ति को आठ दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। इसे गंभीर संवैधानिक उल्लंघन मानते हुए कोर्ट ने पीड़ित को दो लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अवैध हिरासत के मामलों में परिस्थितियों के अनुसार प्रतिदिन 25 हजार रुपये तक का मुआवजा निर्धारित किया जा सकता है, इस राशि की वसूली सीधे दोषी अधिकारियों के वेतन से की जाएगी, जिससे जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
‘शांति भंग’ के नाम पर कार्रवाई पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केवल ‘शांति भंग की आशंका’ का हवाला देकर निर्दोष लोगों को जेल भेजना कानून का दुरुपयोग है, अदालत ने ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की आवश्यकता पर जोर दिया, कोर्ट ने कहा कि पुलिस को अपने अधिकारों का प्रयोग संविधान और कानून के दायरे में रहकर करना होगा। किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता का हनन स्वीकार नहीं किया जा सकता।
पुलिस कमिश्नर से मांगी अनुपालन रिपोर्ट
अदालत ने प्रयागराज पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया है कि इस आदेश के अनुपालन में उठाए गए कदमों की विस्तृत रिपोर्ट 14 सितंबर तक न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाए, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश में पुलिस कार्यप्रणाली और जवाबदेही के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है, इससे अवैध हिरासत, मनमानी गिरफ्तारी और अधिकारों के दुरुपयोग से जुड़े मामलों में पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी और बढ़ेगी, यह फैसला न केवल नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है, बल्कि कानून के शासन और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने वाला निर्णय भी माना जा रहा है।





