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राम मंदिर विवाद के बीच क्यों बढ़ गई है योगी की ताकत! विरोधियों पर अकेले पड़े भारी

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उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त एक ऐसे दहकते हुए ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ी है, जहां कभी भी, कुछ भी हो सकता है! योगी आदित्यनाथ के विरोधी लगातार हुंकार भर रहे हैं और मन ही मन यह मानकर बैठे हैं कि अब उन्हें ‘राम मंदिर के दानपात्र में कथित चोरी’ का एक ऐसा अचूक मुद्दा मिल गया है, जिसके बलबूते वे योगी को लखनऊ की सत्ता से बेदखल कर देंगे। लेकिन शायद इन विरोधियों को इस बात का रत्ती भर भी अहसास नहीं है कि योगी आदित्यनाथ वो फायरब्रैंड नेता हैं, जो हमेशा से अपने दुश्मनों पर भारी पड़े हैं। अगर इतिहास के पन्ने पलटकर देखें, तो यह साफ हो जाता है कि योगी ने कभी भी किसी के सामने घुटने नहीं टेके। यह वही योगी आदित्यनाथ हैं, जिन्होंने गोरखपुर में अपनी ही पार्टी (भाजपा) के खिलाफ जाकर अपना अलग प्रत्याशी (राधा मोहन दास) खड़ा किया, न सिर्फ चुनाव जीताकर दिखाया बल्कि पूरी भाजपा को वहां पटखनी दे दी थी। आज स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने में योगी आदित्यनाथ को भाजपा का सबसे ताकतवर नेता और भविष्य के ‘प्रधानमंत्री पद’ के रूप में देखा जा रहा है। आज देश की राजनीति में ‘योगी मॉडल’ कड़क प्रशासनिक व्यवस्था का पर्याय बन चुका है।

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आलम यह है कि भाजपा शासित राज्यों के तमाम मुख्यमंत्री और दिग्गज नेता इस मॉडल को अपने यहाँ लागू करने की होड़ में हैं। पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी हों, बिहार में सम्राट चौधरी हों, या फिर मध्य प्रदेश में खुद मुख्यमंत्री मोहन यादव—हर कोई आज ‘बाबा के बुलडोजर मॉडल’ को कॉपी करता हुआ नजर आ रहा है। उत्तर प्रदेश में जो माफिया कभी समानांतर सरकार चलाते थे, आज वे पूरी तरह मिट्टी में मिल चुके हैं। सूबे में भू-माफिया इस कदर कांप रहे हैं कि उनके हौसले पस्त हैं। एक दौर था जब आजम खान, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे बाहुबलियों की मर्जी के बिना उत्तर प्रदेश में पत्ता भी नहीं हिलता था। आज अतीक और मुख्तार का साम्राज्य अतीत का हिस्सा बन चुका है, और कभी बेहद ताकतवर रहे आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी पर बाबा का बुलडोजर लगातार दस्तक दे रहा है। राजनीतिक गलियारों में साफ कहा जा रहा है कि आने वाले कुछ ही दिनों के भीतर आजम खान की बची-खुची रियासत और सियासत, सब कुछ हमेशा के लिए जमींदोज हो जाएगी।

इस सब के बीच राम मंदिर के दानपात्र में चोरी के मामले ने यूपी की सियासत को पूरी तरह गर्मा दिया है। इस मुद्दे पर जहां एक तरफ भाजपा का एक धड़ा, आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद बैकफुट पर दिखाई दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ की साख पर उत्तर प्रदेश का कोई भी सनातनी प्रेमी या साधु-संत एक भी उंगली नहीं उठा पा रहा है। जनता और संतों का साफ तौर पर मानना है कि—”जब तक योगी हैं, तब तक राम मंदिर में चोरी करने वाले अपराधियों का बचना नामुमकिन है।” अपराधियों पर बाबा किसी भी प्रकार की कोताही नहीं बरतेंगे। दिलचस्प बात यह है कि जहां इस संवेदनशील मुद्दे पर दिल्ली का शीर्ष नेतृत्व, आरएसएस और वीएचपी के बड़े पदाधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं, वहीं योगी आदित्यनाथ लगातार जनता के बीच जाकर दहाड़ रहे हैं और अपराधियों को खुली चुनौती दे रहे हैं। यह उनकी बेबाक और निर्भीक राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है। राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि पिछले कुछ दिनों में योगी आदित्यनाथ के ऊपर चौतरफा हमले तेज हुए हैं।

उन्हें घेरने की बिसात सिर्फ विरोधी दलों ने नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर से भी बिछाई जा रही है। चाहे यूजीसी का मुद्दा हो, योगी सरकार पर लगने वाले ‘ठाकुरवाद’ के कथित आरोप हों, या फिर अब राम मंदिर में चोरी का मामला—विरोधियों के साथ-साथ पार्टी के अंदरूनी गलियारों में भी योगी के खिलाफ एक माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। राजनीतिक गलियारों में अटकलें लगाई जा रही हैं कि जिस तरह मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान में वसुंधरा राजे और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह जैसे दिग्गजों को किनारे किया गया—खासकर शिवराज सिंह चौहान, जो एक समय जन-आधार के मामले में शीर्ष नेतृत्व के समकक्ष खड़े दिखाई देते थे, उन्हें दिल्ली ने अचानक हटाकर मोहन यादव को कमान सौंप दी—ठीक वैसे ही दिल्ली का शीर्ष नेतृत्व बहुत जल्द योगी आदित्यनाथ पर भी कोई बड़ा और चौंकाने वाला निर्णय ले सकता है। हालांकि, जमीनी हकीकत और राजनीतिक सूत्र इस सिद्धांत को सिरे से खारिज करते हैं।

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विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई भी आत्मघाती कदम उठाना दिल्ली के लिए मुमकिन नहीं है। योगी आदित्यनाथ आज देश भर में प्रखर हिंदुत्व और कड़क कानून-व्यवस्था का सबसे बड़ा ‘पोस्टर बॉय’ हैं। देश के 22 से अधिक राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए उनकी भारी डिमांड रहती है। यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का खुला और अटूट समर्थन हमेशा योगी आदित्यनाथ के पक्ष में रहता है। संघ उत्तर प्रदेश में योगी के नेतृत्व को पूरी तरह सुरक्षित रखना चाहता है, क्योंकि आरएसएस भाली-भांति जानता है कि 2027 के विधानसभा चुनाव और 2029 के आम चुनाव में योगी आदित्यनाथ ही वह ‘मास्टर चाबी’ हैं, जो किसी भी बंद सियासी ताले को एक झटके में खोल सकते हैं। संघ ने समय-समय पर योगी के पक्ष में खड़े होकर दिल्ली को कड़ा संदेश भी दिया है। आरएसएस का वह बयान आज भी राजनीतिक गलियारों में गूंज रहा है, जिसमें साफ कहा गया था कि—”योगी आदित्यनाथ के खिलाफ जाने वाला या उनके खिलाफ बयानबाजी करने वाला नेता संघ की नजरों में बागी माना जाएगा। हाल ही में राम मंदिर से जुड़ी कुछ जांचों और स्थानीय ट्रस्ट के मुद्दों पर योगी सरकार ने जो कड़ा और सख्त रुख अख्तियार किया है, उसे दिल्ली के फैसलों से अलग हटकर देखा गया है।

राजनीतिक सूत्र गवाही देते हैं कि योगी आदित्यनाथ ने राम मंदिर ट्रस्ट के इस कथित चोरी के मामले में अकेले दम पर एक्शन लेकर दिल्ली को अपनी ताकत का अहसास करा दिया है। यह साफ दिखाता है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए भी योगी आदित्यनाथ को हिला पाना या उनकी राह में रोड़े अटकाना इतना आसान नहीं है। यही कारण है कि योगी आदित्यनाथ आज दिल्ली या किसी भी अन्य आंतरिक दबाव की परवाह किए बिना, पूरी तरह निर्भीक होकर उत्तर प्रदेश में अपनी शर्तों पर राज कर रहे हैं। विरोधियों का चक्रव्यूह चाहे जितना गहरा हो, इस संन्यासी की सियासी बिसात को मात देना फिलहाल नामुमकिन नजर आता है।