केंद्र सरकार ने संसद के आगामी मानसून सत्र की तारीखों का आधिकारिक ऐलान कर दिया है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने जानकारी दी है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक लोकसभा और राज्यसभा का सत्र बुलाने की मंजूरी प्रदान कर दी है। इस दौरान देशहित से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा और बहस होने की उम्मीद है। हालांकि, सत्र की घोषणा के साथ ही दो बड़े मुद्दे राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गए हैं—संविधान संशोधन से जुड़ा प्रस्तावित विधेयक और ऑपरेशन सिंदूर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान।
संसद के इस मानसून सत्र में संविधान के 130वें संशोधन विधेयक, 2025 को लेकर विशेष चर्चा होने की संभावना है। यह विधेयक फिलहाल संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के विचाराधीन है और इसकी रिपोर्ट 17 जुलाई को प्रस्तावित बैठक में स्वीकार की जा सकती है। इस विधेयक का सबसे चर्चित और विवादास्पद प्रावधान यह है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होकर लगातार 30 दिनों तक जेल में रहते हैं, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना होगा। यदि संबंधित पदाधिकारी इस्तीफा नहीं देते हैं, तो उन्हें स्वतः पद से हटाने का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है।
सूत्रों के अनुसार, जेपीसी इस प्रावधान को हटाने की सिफारिश करने के पक्ष में नहीं दिखाई दे रही है। हालांकि, समिति कुछ ऐसे सुरक्षा उपायों की सिफारिश कर सकती है, जिनसे कानून का राजनीतिक दुरुपयोग रोका जा सके और किसी व्यक्ति को दुर्भावनापूर्ण तरीके से निशाना न बनाया जा सके। यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है, तो भारतीय राजनीति में जवाबदेही और नैतिकता को लेकर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
इसी बीच विपक्ष ने मानसून सत्र में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भी घेरने की तैयारी कर ली है। विपक्षी दलों का आरोप है कि रक्षा मंत्री ने पिछले वर्ष संसद में ऑपरेशन सिंदूर को लेकर जो बयान दिया था, उसमें तथ्यों को लेकर विसंगतियां थीं। कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के अन्य दलों का दावा है कि राजनाथ सिंह ने लोकसभा में कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना का कोई भी जवान शहीद नहीं हुआ था, जबकि बाद में सरकार की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी में सैनिकों के हताहत होने की पुष्टि की गई।
इसी मुद्दे को आधार बनाते हुए विपक्ष संसद में रक्षा मंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन (ब्रीच ऑफ प्रिविलेज) का मामला उठाने की तैयारी कर रहा है। विपक्ष का कहना है कि यदि संसद को गलत जानकारी दी गई है, तो यह गंभीर मामला है और इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। वहीं, सरकार की ओर से इस मुद्दे पर अभी तक कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी मानसून सत्र केवल विधायी कार्यवाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें कई संवेदनशील और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मुद्दों पर तीखी बहस देखने को मिल सकती है। एक ओर जहां जवाबदेही से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा होगी, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा और संसद में दिए गए बयानों की सत्यता को लेकर भी सरकार और विपक्ष आमने-सामने नजर आ सकते हैं।
ऐसे में 20 जुलाई से शुरू होने वाला संसद का मानसून सत्र राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है, जिस पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।






