लखनऊ। उत्तर प्रदेश में गौवंश के परिवहन को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल संदेह या आशंका के आधार पर किसी वाहन को जब्त कर लेना उचित नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रदेश के भीतर गौवंश के परिवहन के लिए किसी परमिट या लाइसेंस की आवश्यकता नहीं है। ऐसे में सिर्फ इस आधार पर कि किसी वाहन में गौवंश ले जाया जा रहा था, उसे गौहत्या या अवैध तस्करी की आशंका में जब्त नहीं किया जा सकता।
यह मामला विनोद कुमार सिंह की याचिका से जुड़ा है। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप जैन ने चंदौली के जिलाधिकारी द्वारा जारी वाहन जब्ती आदेश और वाराणसी के मंडलायुक्त के अपीलीय आदेश को रद्द कर दिया। प्रशासन ने याचिकाकर्ता के वाहन को गौ तस्करी के आरोप में जब्त करने के बाद नीलाम कर दिया था।
वाहन जब्ती के साथ नीलामी पर भी सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उनके वाहन का इस्तेमाल गौवंश को वध के लिए ले जाने के आरोप में जब्त किया गया था, जबकि इस संबंध में प्रशासन पर्याप्त प्रमाण पेश नहीं कर सका। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि केवल वाहन में गौवंश पाए जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उन्हें वध के उद्देश्य से ही ले जाया जा रहा था।
अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार यह साबित करने में असफल रही कि गौवंश को वध के उद्देश्य से राज्य की सीमा से बाहर ले जाया जा रहा था। ऐसे में वाहन की जब्ती और बाद में उसकी नीलामी को अदालत ने अवैध और असंवैधानिक माना।
20 हजार रुपये प्रतिमाह मुआवजे का आदेश
हाईकोर्ट ने प्रशासन को निर्देश दिया कि जब्त वाहन को एक सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को वापस किया जाए। इसके साथ ही वाहन जब्त किए जाने की तारीख 19 सितंबर 2024 से वाहन वापस सौंपे जाने तक की अवधि के लिए 20 हजार रुपये प्रति माह की दर से मुआवजा देने का आदेश दिया गया है।अदालत ने मानसिक प्रताड़ना के लिए याचिकाकर्ता को अतिरिक्त 25 हजार रुपये देने का भी निर्देश दिया है। अदालत के आदेश के मुताबिक, 5 अगस्त 2026 तक की अवधि के आधार पर मुआवजे की राशि करीब 4.75 लाख रुपये बैठती है। यदि वाहन लौटाने में और देरी होती है तो मुआवजे की राशि भी बढ़ सकती है।
अधिकारी से वसूली कर सकती है सरकार
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि मुआवजे की राशि राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को देनी होगी। हालांकि, सरकार चाहे तो बाद में यह रकम उस अधिकारी से वसूल सकती है, जिसकी कार्रवाई के कारण वाहन को अवैध रूप से जब्त किया गया।
सिर्फ आशंका के आधार पर कार्रवाई नहीं
अदालत की टिप्पणी का अहम पहलू यह है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल आशंका या संदेह के आधार पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने कहा कि वाहन में गौवंश का परिवहन अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उनका उद्देश्य वध थाइस फैसले में अदालत ने प्रदेश के भीतर गौवंश परिवहन से जुड़े नियमों को भी स्पष्ट किया है। कोर्ट के मुताबिक, जहां आवश्यक कानूनी अनुमति का प्रावधान नहीं है, वहां महज संदेह के आधार पर वाहन जब्त करना उचित नहीं माना जा सकता हाईकोर्ट के इस फैसले को प्रशासनिक कार्रवाई में कानून के पालन और नागरिकों के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण आदेश के तौर पर देखा जा रहा है। मामले में अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि कानून-व्यवस्था लागू करने के नाम पर किसी नागरिक की संपत्ति के खिलाफ कार्रवाई करते समय ठोस कानूनी आधार और पर्याप्त साक्ष्य जरूरी हैं।






