देश में यूजीसी की आग धधकती जा रही , आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट को लेकर पूरे देश में सवर्णों का उबाल चरम पर है। आंखों में आक्रोश, जुबान पर तीखे सवाल और हवाओं में ‘जय परशुराम’ और ‘जय भवानी’ के गगनभेदी नारे गूंज रहे हैं। सड़कों पर उतरा ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज अब आर-पार के मूड में आ चुका है और इस बार लड़ाई किसी एक शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर में आंदोलनों की एक ऐसी सुनामी आ रही है जो सरकार की नींद उड़ाने के लिए काफी है! इस बड़े संग्राम का आगाज महिपाल सिंह मकराना की 800 किलोमीटर लंबी पदयात्रा से हो चुका है, जिन्होंने साफ चेतावनी दी है कि मांगें न मानने पर यह आंदोलन पूरे देश को हिलाकर रख देगा।

इसी कड़ी में 17 अगस्त को परशुराम दल सवर्णों की आवाज बुलंद करने जा रहा है, तो वहीं 21 अगस्त को हर्ष दुबे ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ का शंखनाद करेंगे। मामला यहीं नहीं रुकता, 23 अगस्त को करणी सेना ‘सवर्ण आक्रोश महापंचायत’ करने जा रही है, जिसके लिए करणी सेना प्रमुख राज सिंह शेखावत 15 हजार किलोमीटर की मैराथन वाहन यात्रा निकालकर कोने-कोने में जनसभाएं कर रहे हैं और लाखों सवर्णों को एक मंच पर लाने की तैयारी है। इसके अलावा सूरजपाल सिंह अम्मू ने उत्तर प्रदेश में एक बड़ी रथ यात्रा निकालने का ऐलान कर दिया है। इन तमाम बड़े आंदोलनों का मकसद बिल्कुल साफ है—यूजीसी के नए नियमों को पूरी तरह खत्म किया जाए, आरक्षण की समीक्षा हो और एससी-एसटी एक्ट के गलत इस्तेमाल पर लगाम लगे! सवर्ण समाज का स्पष्ट कहना है कि यह उनके बच्चों के वजूद और भविष्य का सवाल है, जिससे वे कोई समझौता नहीं करेंगे। एक तरफ जहां सरकार आंदोलनकारी छात्रों से बातचीत कर रही है, वहीं बड़ा सवाल यह है कि सवर्ण समाज की इस हुंकार को सरकार कब सुनेगी? राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं गर्म हैं और बृजभूषण शरण सिंह जैसे नेता भी दतिया और बांकीपुर चुनावों का हवाला देकर कह चुके हैं कि सवर्णों का गुस्सा चुनाव हरा सकता है। अगर सवर्ण समाज इसी तरह नाराज रहा, तो 2027 और 2029 के चुनावों में बीजेपी का राजनीतिक गणित बिगड़ना तय है। दिल्ली हाईकमान में मंथन जारी है, लेकिन देखना यह होगा कि क्या सरकार इस सुलगते गुस्से को शांत कर पाती है या सवर्णों का यह आक्रोश सत्ता के समीकरण ही बदलकर रख देगा!






