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बाह में राजघराने की पकड़ को चुनौती! 2027 में BJP-SP-BSP के बीच त्रिकोणीय सियासी मुकाबले के आसार

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आगरा: उत्तर प्रदेश की बाह विधानसभा सीट की राजनीति में राजघराने का प्रभाव लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। चुनाव दर चुनाव राजनीतिक दल और उम्मीदवार बदलते रहे, लेकिन क्षेत्र की सियासत में राज परिवार की मौजूदगी और प्रभाव लगातार दिखाई देता रहा है। अब 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर एक बार फिर बाह की सियासत गर्माने लगी है। बीजेपी के सामने समाजवादी पार्टी और बसपा अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान तैयार करने में जुटी हैं।

बाह विधानसभा क्षेत्र चंबल के बीहड़ों और यमुना नदी के किनारे बसा हुआ इलाका है। भौगोलिक परिस्थितियों के साथ-साथ यहां की राजनीति भी काफी दिलचस्प रही है। क्षेत्र में राजघराने का राजनीतिक प्रभाव लंबे समय से कायम रहा है। हालांकि, 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने यहां जीत दर्ज कर इस प्रभाव को चुनौती जरूर दी थी, लेकिन इसके बाद भी राज परिवार की राजनीतिक पकड़ पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

बीजेपी के सामने सत्ता बचाने की चुनौती

फिलहाल बाह विधानसभा सीट से बीजेपी की रानी पक्षालिका सिंह विधायक हैं। क्षेत्र में सड़क, ग्रामीण सुविधाओं, सिंचाई और विकास योजनाओं को लेकर उनकी सक्रियता चर्चा में रही है। समर्थकों की ओर से क्षेत्र में कराए गए विकास कार्यों को उपलब्धि के तौर पर पेश किया जाता है।लेकिन 2027 का चुनाव बीजेपी के लिए आसान नहीं माना जा रहा। विपक्षी दल लगातार अपने संगठन को मजबूत करने और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरण तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी जहां अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को मजबूत करने के साथ नए मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश कर सकती है, वहीं बसपा भी अपने प्रभाव वाले वर्गों के बीच दोबारा पकड़ बनाने की रणनीति पर काम कर सकती है।

खेती और सिंचाई भी चुनावी मुद्दे

बाह की अर्थव्यवस्था में कृषि की बड़ी भूमिका है। क्षेत्र में सिंचाई व्यवस्था और किसानों से जुड़े मुद्दे चुनावी बहस का हिस्सा रहे हैं। लिफ्ट इरिगेशन जैसी योजनाओं से किसानों को फायदा मिलने की बात कही जाती रही है। वहीं, खेती के पैटर्न में बदलाव के साथ आलू जैसी फसलें भी क्षेत्र में महत्वपूर्ण हो गई हैं।सड़क निर्माण, ग्रामीण संपर्क, बिजली, रोजगार, सिंचाई और स्थानीय सुविधाएं ऐसे मुद्दे हैं, जिनका असर आगामी चुनाव में देखने को मिल सकता है। इसके अलावा धार्मिक स्थलों के विकास और सौंदर्यीकरण को लेकर भी राजनीतिक चर्चा होती रही है।

जातीय समीकरण तय करेंगे चुनावी दिशा?

बाह विधानसभा सीट पर जातीय और सामाजिक समीकरण भी बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यही वजह है कि 2027 के चुनाव में बीजेपी, सपा और बसपा तीनों ही दल अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश करेंगे।हालांकि अभी चुनाव में समय है और उम्मीदवारों को लेकर तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां बढ़ने के साथ मुकाबले के संभावित समीकरण भी चर्चा में आने लगे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2027 में बाह का राजघराना अपना पुराना राजनीतिक प्रभाव बरकरार रख पाएगा? या फिर बीजेपी के सामने सपा और बसपा कोई ऐसा नया सामाजिक और राजनीतिक समीकरण खड़ा कर पाएंगी, जो दशकों से चली आ रही सियासी पकड़ को चुनौती दे सके?आगामी विधानसभा चुनाव में बाह की लड़ाई सिर्फ तीन राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं होगी, बल्कि संगठन, स्थानीय मुद्दों, सामाजिक समीकरण और राजघराने के प्रभाव की भी बड़ी परीक्षा मानी जाएगी।

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