यूपी में हत्याओं पर सियासत: क्या पीड़ित की पहचान देखकर उठती है इंसाफ की आवाज?
उत्तर प्रदेश में हत्या की घटनाओं के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है। सवाल यह है कि क्या हर हत्या के बाद पीड़ित परिवार के लिए राजनीतिक आवाज एक जैसी बुलंद होती है? गोंडा में विनोद साहनी की हत्या के बाद जिस तरह नेताओं की सक्रियता देखने को मिली, उसके मुकाबले देवरिया में 23 वर्षीय मनीष सिंह उर्फ मोनू की हत्या को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया कम दिखाई देने के सवाल उठ रहे हैं।
गोंडा के कर्नलगंज में विनोद साहनी की हत्या के बाद कई राजनीतिक नेताओं ने मामले पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। संजय निषाद, मुकेश साहनी, काजल निषाद और अखिलेश यादव समेत कई नेताओं की ओर से मामले को लेकर बयान सामने आए। धरना-प्रदर्शन हुआ और आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग के साथ एनकाउंटर की मांग भी उठी। पीड़ित परिवार के साथ खड़े होने और मदद का भरोसा दिलाने की बात भी सामने आई।
मामले में पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया है। आरोपियों की सामाजिक पहचान को लेकर भी राजनीतिक बहस देखने को मिली। हालांकि, किसी भी हत्या के मामले में दोष और जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए।
देवरिया में मनीष सिंह की हत्या पर सवाल
दूसरी ओर देवरिया में 23 वर्षीय मनीष सिंह उर्फ मोनू की हत्या का मामला भी सामने आया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, मामला आपसी विवाद और पुरानी रंजिश से जुड़ा बताया जा रहा है। चाइना अंसारी, अंबुज विश्वकर्मा, जय किशन यादव और नागेश यादव समेत कुछ लोगों के नाम मामले में सामने आए हैं। पुलिस मामले में अपनी कार्रवाई कर रही है।
लेकिन सवाल यह है कि इस घटना को लेकर वैसी राजनीतिक सक्रियता क्यों नजर नहीं आई, जैसी गोंडा के मामले में देखने को मिली?
वाराणसी के मामले ने भी खड़े किए सवाल
इसी तरह वाराणसी के फूलपुर क्षेत्र में कारोबारी मनीष सिंह की भीड़ द्वारा हत्या किए जाने का मामला भी सामने आया था। इस मामले में कई आरोपियों के जेल जाने की जानकारी सामने आई है।
इन घटनाओं को लेकर अब बहस सिर्फ कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है। सवाल राजनीतिक दलों और नेताओं की भूमिका को लेकर भी उठ रहे हैं।
क्या पीड़ित की पहचान के आधार पर तय होती है सियासी सक्रियता?
गोंडा मामले में अखिलेश यादव द्वारा पीड़ित परिवार से फोन पर बातचीत कर मदद का भरोसा देने की बात सामने आई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या मनीष सिंह के परिवार के साथ भी उसी स्तर की राजनीतिक सक्रियता दिखाई जानी चाहिए थी?
सवाल किसी एक समाज या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या हत्या के हर मामले में पीड़ित परिवार के लिए न्याय की आवाज समान ताकत से उठनी चाहिए?
अगर किसी हत्या के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया मृतक की जाति, पहचान या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर अलग-अलग दिखाई देती है, तो यह राजनीति और समाज दोनों के लिए गंभीर सवाल खड़ा करता है।
न्याय की आवाज सभी के लिए एक जैसी होनी चाहिए
हत्या चाहे किसी भी समाज या वर्ग के व्यक्ति की हो, पीड़ित परिवार का दर्द एक जैसा होता है। अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग भी हर मामले में समान रूप से होनी चाहिए।
ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों को हर पीड़ित परिवार के साथ उसी मजबूती से खड़ा नहीं होना चाहिए, चाहे मृतक की जाति या सामाजिक पहचान कुछ भी हो?
क्योंकि न्याय की लड़ाई अगर पहचान देखकर लड़ी जाएगी, तो सवाल अपराधियों के साथ-साथ उस राजनीतिक व्यवस्था पर भी उठेंगे, जो पीड़ितों के लिए अलग-अलग आवाजें तय करती दिखाई देती है।
