करीब तीन साल की कैद के बाद रिहा हुए समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आज़म ख़ान से मिलने के लिए कानपुर के पूर्व विधायक इरफ़ान सोलंकी अपनी पत्नी और विधायक नसीम सोलंकी के साथ गुरुवार को रामपुर पहुंचे। यह मुलाकात केवल एक राजनीतिक भेंट नहीं थी, बल्कि रिश्तों, जज़्बात और बीते हुए दर्द का मिलन था।
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रामपुर स्थित आज़म ख़ान के आवास पर दोपहर करीब 12:30 बजे पहुंचे इरफ़ान सोलंकी ने लगभग तीन घंटे तक आज़म ख़ान और उनकी पत्नी तंजीम फ़ातिमा से बातचीत की। जैसे ही दोनों नेता आमने-सामने आए, माहौल भावुक हो उठा। कहा जा रहा है कि दोनों की आंखों में आंसू आ गए। एक लंबा आलिंगन और कुछ अनकहे शब्दों के साथ दोनों ने अपने कठिन दिनों की यादें साझा कीं।मुलाकात के दौरान आज़म ख़ान ने एक शेर पढ़ा —कैद में भी ज़िंदगी गुज़री तो कुछ इस अंदाज़ से,ज़ंजीरें भी शर्मिंदा हुईं हमारी हिम्मत देख कर…यह शेर सुनकर पूरा माहौल खामोश हो गया। आज़म ख़ान ने कहा, “हम दोनों की हालत एक जैसी रही है। दोनों नेताओं ने जेल में बिताए उन दिनों का ज़िक्र किया जब उन पर कई तरह के आरोप लगाए गए और कैद के दौरान उन्हें अमानवीय परिस्थितियों से गुज़रना पड़ा।इरफ़ान सोलंकी ने मुलाकात के बाद कहा कि आज़म ख़ान और हमारे परिवार के रिश्ते बहुत पुराने हैं। मेरे पिता हाजी मुस्ताक सोलंकी उनके साथ विधायक रहे हैं। आज़म ख़ान हमारे वालिद की तरह हैं। जब मैं और मेरा भाई जेल में थे, तब आज़म साहब, उनके पुत्र अब्दुल्लाह आज़म और उनकी पत्नी भी जेल में थे। हमारे परिवार और उनके परिवार ने लगभग एक जैसा कठिन दौर देखा है।आज़म ख़ान ने मीडिया से बातचीत में इस भेंट को केवल पारिवारिक मुलाकात कहने से इनकार करते हुए कहा —आप इसे सियासी मुलाकात कहिए या निजी, लेकिन जब राजनीतिक लोग मिलते हैं तो राजनीतिक मायने भी निकलते हैं। उनके वालिद मुस्ताक सोलंकी से मेरा पुराना रिश्ता रहा है। उनके इंतकाल के बाद जब मैं उनके जनाज़े में शरीक हुआ था, वह मेरी ज़िंदगी का आख़िरी ऐसा जनाज़ा था जिसमें इतनी भीड़ मैंने देखी थी। हमारे यहां कहा जाता है कि जिसके जनाज़े में 40 लोग शामिल हों, वह जन्नती होता है।

रामपुर में हुई यह मुलाकात केवल दो पुराने साथियों की नहीं, बल्कि दो पीढ़ियों के संघर्ष की कहानी थी — दो ऐसे नेताओं की जो सत्ता से दूर होकर जेल की दीवारों के पीछे एक जैसे दर्द से गुज़रे। दोनों ने उस वक्त को याद किया जब उनके घरों पर सन्नाटा था, परिवार बिखर गया था और राजनीति से ज़्यादा इंसानियत की परीक्षा चल रही थी।मुलाकात के अंत में दोनों परिवारों ने साथ बैठकर चाय पी, पुरानी बातें साझा कीं और भविष्य की दिशा पर चर्चा भी की। चाहे इसे राजनीति की नज़र से देखा जाए या इंसानियत की, रामपुर की यह भेंट एक दिल से दिल की मुलाकात थी — जिसमें सियासत से ज़्यादा अपनापन झलक रहा था।राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि यह मुलाकात समाजवादी खेमे में पुराने रिश्तों की वापसी और भावनात्मक एकजुटता का संकेत देती है। वहीं, आज़म ख़ान और इरफ़ान सोलंकी के समर्थकों के लिए यह तस्वीर उम्मीद की एक नई कहानी बन गई है — जेल की दीवारों से निकलकर फिर से ज़मीन पर लौटते नेताओं की कहानी।







