राजनीति में अफवाहें अक्सर हवा की तरह फैलती हैं बिना आधार, बिना प्रमाण, सिर्फ माहौल बनाने के लिए। पिछले कुछ दिनों से ठीक ऐसा ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर देखने को मिला। कुछ चैनलों और कुछ कथित सियासी विश्लेषकों” ने यह नरेटिव फैलाना शुरू कर दिया था कि अब योगी आदित्यनाथ का बिहार में दौर खत्म हो गया है। कहा गया कि शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें बिहार में प्रचार से रोक दिया है, और यह भी अफवाह उछाली गई कि योगी की रैलियों पर “अनौपचारिक रोक लगा दी गई है।परंतु, राजनीति में सच देर तक छिप नहीं सकता। योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर अपने अंदाज में जवाब दिया है, काम से, शब्दों से नहीं।
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29 अक्टूबर को बिहार की सियासत में फिर से योगी इफेक्ट देखने को मिलेगा। इस दिन बिहार की अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों सिवान, शाहपुर और बक्सर में योगी आदित्यनाथ जनसभाएं करेंगे। उनके साथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी बिहार के अन्य हिस्सों में रैली करेंगे। यह वही बिहार है जहां कुछ सप्ताह पहले योगी की दो जनसभाओं ने विपक्ष की नींद उड़ा दी थी।बीते दस दिनों में जब योगी आदित्यनाथ ने बिहार में कोई रैली नहीं की, तब कुछ राजनीतिक खेमों ने यह कहानी गढ़ी कि शायद अब दिल्ली नेतृत्व उन्हें बिहार में प्रचार की अनुमति नहीं देगा। कहा गया कि भाजपा नेतृत्व चाहता है कि योगी हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण से बचें।
लेकिन इन सब अफवाहों का पर्दाफाश अब खुद भाजपा के मेगा कैंपेन शेड्यूल ने कर दिया है, योगी फिर मैदान में हैं, और इस बार पहले से ज्यादा जोरदार तरीके से।राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि योगी सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर सियासी एनर्जी का प्रतीक बन चुके हैं। उनका भाषण हो, या उनकी उपस्थिति भीड़ का जोश और विपक्ष की बेचैनी, दोनों साथ-साथ बढ़ जाते हैं। बिहार में उनकी लोकप्रियता किसी राष्ट्रीय नेता से कम नहीं है।
योगी आदित्यनाथ जब मंच पर आते हैं, तो उनका अंदाज बाकी नेताओं से बिल्कुल अलग होता है। वह न घुमावदार भाषा बोलते हैं, न चुनावी जुमले। सीधे-सपाट, तीखे और हिंदुत्व के अपने ब्रांड के साथ जनता से संवाद करते हैं। उनके भाषणों में धर्म, राष्ट्रवाद और कानून व्यवस्था का सम्मिश्रण होता है। यही वजह है कि उनकी रैलियों के बाद बिहार की सियासी हवा अचानक बदल जाती है।तेजस्वी यादव और राहुल गांधी जैसे नेताओं के लिए यह “योगी इफेक्ट” सबसे बड़ा सिरदर्द है। उन्हें पता है कि योगी की रैलियों का असर सीधे तौर पर हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण पर पड़ता है। और अगर बिहार में ध्रुवीकरण हुआ, तो विपक्ष की पूरी रणनीति चरमरा जाएगी।तेजस्वी यादव की पार्टी RJD और कांग्रेस को यह अच्छी तरह समझ है कि योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। वह अब एक राष्ट्रीय चेहरा हैं, जो हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीति के पोस्टर आइकन बन चुके हैं।
उनके मंच से उठने वाला हर नारा जय श्रीराम भारत माता की जय सीधे जनता के दिल तक पहुंचता है।यही कारण है कि विपक्ष लगातार यह दिखाने की कोशिश करता रहा कि योगी को बिहार में प्रचार से रोका गया है। पर अब जब 29 अक्टूबर की रैलियों की घोषणा हो चुकी है, तो विपक्ष की सारी सियासी स्क्रिप्ट धरी की धरी रह गई है।29 अक्टूबर का दिन इसलिए भी अहम है क्योंकि अमित शाह और योगी आदित्यनाथ भाजपा की दो सबसे प्रभावशाली सियासी आवाजें एक साथ बिहार के मैदान में उतर रही हैं।शाह जहां रणनीति और संगठन के उस्ताद माने जाते हैं, वहीं योगी जनता की नब्ज को समझने वाले नेता हैं।
एक तरफ मास्टर स्ट्रैटेजिस्ट, तो दूसरी तरफ जनप्रिय फायरब्रांड चेहरा यह जोड़ी भाजपा के लिए बिहार में एक नई ऊर्जा लेकर आ रही है।योगी आदित्यनाथ की पहचान केवल हिंदुत्व तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में उन्होंने जिस सख्ती से कानून-व्यवस्था को सुधारने का काम किया, अपराधियों पर जिस तरह नकेल कसी, और विकास परियोजनाओं को जिस तेजी से आगे बढ़ाया उसने उन्हें कर्मयोगी बना दिया है। यही छवि अब बिहार की जनता के बीच भरोसे का प्रतीक बन रही है।अब इस पूरी खबर का निष्कर्ष क्या है तो वो भी आप जान लीजिये ,,राजनीति में अफवाहें हमेशा चलती रहेंगी। लेकिन सच्चे नेता अपनी मौजूदगी से जवाब देते हैं, शब्दों से नहीं।योगी आदित्यनाथ ने यही किया है।29 अक्टूबर को बिहार की सियासी फिजा फिर बदलेगी।और यह संदेश साफ है कि जो योगी को रोकने की बात करते हैं, वे दरअसल जनता की आवाज को रोकना चाहते हैं।क्योंकि बिहार की मिट्टी अब फिर से तैयार है योगी की गरज और शाह की रणनीति के संग एक नए सियासी अध्याय के लिए।



