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‘जय भीम’ के नारे और सवालों के घेरे में चंद्रशेखर आज़ाद रावण! करीबी दोस्त के घर करोड़ों का ड्रग्स, हथियार और खौफ की कहानी

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मंचों से ‘जय भीम’, ‘जय संविधान’ और “आपके दुश्मन ब्राह्मणवाद हैं, मुसलमान नहीं” जैसे नारे देने वाले चंद्रशेखर आज़ाद रावण अब एक ऐसे मामले में घिरते नज़र आ रहे हैं, जिसने उनकी राजनीति की नैतिक जमीन पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। वजह उनके बेहद करीबी माने जाने वाले मुस्लिम दोस्त दिलावर खान के घर से करीब 3 करोड़ रुपये के ड्रग्स और केमिकल, 12 बोर की बंदूक, 91 कारतूस, दो मोर और चंदन की लकड़ियां बरामद होना।

इस मामले में पुलिस ने अब तक 16 लोगों को हिरासत में लिया है। हैरानी की बात यह है कि जैसे ही ये गिरफ्तारियां हुईं, इलाके में पीड़ित और त्रस्त ग्रामीणों ने जश्न मनाया। ग्रामीणों का कहना है कि दिलावर खान का पूरे गांव में आतंक था जमीन कब्जाने से लेकर खुलेआम धमकियों तक। ग्रामीणों के मुताबिक, 1985-86 में गांव के ही रघुनाथ धाकड़ की हत्या हुई थी, और उस मामले में दिलावर खान को मुख्य आरोपी बताया जाता है। आरोप है कि उसने वर्षों तक गांव में डर का माहौल बनाए रखा।

दिलावर के पास महंगी लग्ज़री गाड़ियों का काफिला था, जो उसकी अवैध गतिविधियों की ओर इशारा करता रहा, लेकिन सवाल यह है कि यह सब इतने वर्षों तक कैसे चलता रहा?सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पुलिस के अनुसार दिलावर खान के मकान के बाहर “अखिल भारतीय अनुसूचित जाति युवजन समाज का संभाग अध्यक्ष एवं पत्रकार” लिखा हुआ बोर्ड लगा था। यानी दलित आंदोलन और सामाजिक न्याय की राजनीति की आड़ में अपराध का नेटवर्क खड़ा किया गया।

दिलावर खान आज़ाद समाज पार्टी से जुड़ा रहा है और पार्टी ने उसे चुनावी टिकट भी दिया था, हालांकि उसे हार का सामना करना पड़ा।अब सवाल सीधे चंद्रशेखर आज़ाद रावण पर उठ रहे हैं जिस राजनीति में वे नैतिकता, शोषण-विरोध और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, उसी राजनीति के भीतर अपराध, ड्रग्स और हथियारों से जुड़ा व्यक्ति इतना करीब कैसे पहुंचा?क्या यह सिर्फ संयोग है, या फिर संगठन के भीतर गलत चेहरों को संरक्षण दिया गया?‘जय भीम’ के नारों के बीच अब यह सवाल गूंज रहा है कि सामाजिक न्याय की राजनीति में अपराधियों के लिए कोई जगह है या नहीं?और अगर है, तो जवाबदेही किसकी होगी दिलावर खान की, या उसे आगे बढ़ाने वालों की?

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