उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त सिर्फ गर्म नहीं है, बल्कि उफान पर है। हालात ऐसे बन चुके हैं कि सत्ता की तपिश अब लखनऊ की सीमाएं लांघकर दिल्ली तक महसूस की जा रही है। सवाल यह नहीं रह गया है कि यूपी में क्या हो रहा है, बल्कि असली सवाल यह है कि जो कुछ भी हो रहा है, वह किसके इशारे पर हो रहा है। बीते कुछ दिनों में घटनाओं की जो श्रृंखला सामने आई है, उसने साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में अब मुकाबला विपक्ष से नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर ही भीतर चल रहा है।
महोबा की सड़कों पर जो दृश्य दिखा, वह किसी सामान्य प्रशासनिक असहमति से कहीं आगे का संकेत था। भारतीय जनता पार्टी के ही विधायक बृजभूषण राजपूत का, पार्टी के वरिष्ठ और योगी आदित्यनाथ के सबसे करीबी माने जाने वाले जल शक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह के काफिले को बीच सड़क पर घेर लेना, और गांवों के विकास को लेकर खुलेआम तीखी बहस करना, दरअसल भीतर ही भीतर पल रहे असंतोष का विस्फोट था। आरोप सीधे थे सड़कें खोद दी गईं, गड्ढे बना दिए गए, लेकिन पानी अब तक नहीं आया। विकास अधूरा है और जवाबदेही गायब। यह बहस कुछ मिनटों की नहीं, बल्कि घंटों चली और हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि दोनों पक्षों के समर्थक आमने-सामने आ गए। यह दृश्य अपने आप में इस बात का सबूत था कि पार्टी के भीतर अनुशासन से ज्यादा अब शक्ति प्रदर्शन हावी होता जा रहा है।
अगर इस घटना को अलग-थलग रखकर देखा जाए तो यह एक स्थानीय विवाद लग सकता है, लेकिन जब इसे पिछले कुछ महीनों की घटनाओं से जोड़कर देखा जाता है तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाती है। लगातार ऐसे मुद्दे सामने आ रहे हैं, जिनका सिरा किसी न किसी तरह से योगी आदित्यनाथ तक पहुंचाने की कोशिश हो रही है। कभी कोडिंग कफ सिरप का मामला उठता है और योगी सरकार के विभाग को घेरा जाता है, तो कभी ठाकुरवाद का नरेटिव गढ़कर यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि सरकार एक खास वर्ग के पक्ष में काम कर रही है।
ब्राह्मण विधायकों की बैठक को भी इसी क्रम में देखा गया। बैठक का मकसद चाहे जो रहा हो, लेकिन उसे इस तरह पेश किया गया जैसे ब्राह्मण समाज योगी से नाराज़ हो। बाद में खुद ब्राह्मण विधायकों ने साफ किया कि वे योगी के समर्थन में थे, इसके बावजूद बात दिल्ली तक पहुंची और वहां से सख्त संदेश आया।
ऐसी बैठकों पर रोक लगाने और यहां तक कि एफआईआर तक की चेतावनी दी गई। इससे यह संकेत साफ था कि संगठन और सरकार के बीच संतुलन को लेकर ऊपर तक चिंता मौजूद है। इसके बाद वोटर लिस्ट और एसएआर को लेकर संगठन और सरकार के बीच बयानबाज़ी ने इस खींचतान को और उजागर कर दिया। योगी आदित्यनाथ ने जहां कार्यकर्ताओं और मंत्रियों को अपने क्षेत्रों में अधिक से अधिक मतदाताओं के नाम जुड़वाने की जिम्मेदारी सौंपी, वहीं पंकज चौधरी का बयान सामने आया कि ड्राइविंग सीट पर सरकार है और किसी भी पात्र मतदाता का नाम नहीं कटना चाहिए। यह टकराव शब्दों का था, लेकिन संदेश बहुत गहरा था। इसी बीच माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का धरना और उनके आरोपों ने सरकार के सामने एक नया मोर्चा खोल दिया। स्नान से रोके जाने का आरोप, फिर खुले मंच से योगी सरकार और प्रशासन पर सवाल, और अंत में 40 दिन का अल्टीमेटम—लिखित माफी और गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने की मांग। साथ ही चेतावनी भी कि अगर मांगें नहीं मानी गईं तो लखनऊ में संतों का बड़ा आंदोलन होगा। यह सिर्फ धार्मिक असंतोष नहीं था, बल्कि सत्ता पर बढ़ता नैतिक और राजनीतिक दबाव भी था। इन्हीं तमाम घटनाओं के बीच वह फैसला आया, जिसने यूपी के सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा हलचल मचा दी। दिल्ली से साफ कर दिया गया कि उत्तर प्रदेश में भाजपा विधायकों के कामकाज का व्यापक सर्वे कराया जाएगा। यह सर्वे एक नहीं, बल्कि दो अलग-अलग कंपनियों से कराया जाएगा और दोनों की रिपोर्ट का मिलान किया जाएगा, ताकि किसी भी तरह की पक्षपातपूर्ण या एकतरफा रिपोर्ट की गुंजाइश न रहे।
फरवरी के दूसरे या तीसरे हफ्ते से शुरू होने वाला यह दूसरा चरण अब कई विधायकों की बेचैनी की वजह बन चुका है। खास बात यह है कि यह सर्वे सिर्फ भाजपा की मौजूदा 258 सीटों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर कराया जाएगा, जिनमें सहयोगी दलों की सीटें भी शामिल होंगी। सर्वेयर फील्ड में उतरकर न सिर्फ पार्टी पदाधिकारियों, बल्कि आरएसएस से जुड़े लोगों, दुकानदारों, वकीलों, डॉक्टरों, शिक्षकों, युवाओं और महिलाओं से बातचीत करेंगे। सार्वजनिक स्थानों पर आम लोगों के बीच चुनावी मुद्दों को उठाकर मौजूदा विधायक की छवि, कार्यशैली और स्वीकार्यता को परखा जाएगा। सर्वे का फोकस साफ है—क्या विधायक जनता के बीच रहते हैं, क्या उन्होंने पिछले चार साल में वास्तविक विकास कराया है, उनकी जाति और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उनकी कैसी छवि है, उन पर कोई बड़ा विवाद या भ्रष्टाचार का आरोप तो नहीं, और सबसे अहम सवाल यह कि अगर उन्हें फिर से टिकट दिया जाए तो क्या वे चुनाव जीत सकते हैं। अगर जवाब नकारात्मक हुआ, तो विकल्प कौन हो सकता है, इस पर भी रिपोर्ट तैयार की जाएगी। जिन विधायकों को लेकर नकारात्मक फीडबैक आएगा, उनका टिकट कटना लगभग तय माना जा रहा है।
इतिहास भी यही बताता है कि भाजपा इन सर्वे को हल्के में नहीं लेती। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले जार्विस और एबीएम जैसी एजेंसियों के सर्वे के आधार पर 120 से अधिक विधायकों के टिकट काटे गए थे और 165 सीटों पर नए चेहरों को मौका दिया गया था। इस बार दांव और भी बड़ा है, क्योंकि सवाल सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि सत्ता के संतुलन का है। इन सबके बीच आरएसएस की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। संघ चुप जरूर है, लेकिन वह हर गतिविधि को बारीकी से देख और समझ रहा है। सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज है कि दिल्ली की टीम चाहती है कि योगी आदित्यनाथ पूरी तरह नियंत्रण में रहें और इसी रणनीति के तहत पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भेजा गया है, ताकि संगठन और सरकार की डोर एक ही हाथ में रहे। पंकज चौधरी के आने के बाद पार्टी के भीतर बढ़ती खींचतान को इसी नजरिए से देखा जा रहा है—चाहे वह ब्राह्मण विधायकों की बैठक का मामला हो या फिर सड़कों पर उतरा मंत्री-विधायक विवाद।निष्कर्ष साफ है। उत्तर प्रदेश में इस वक्त लड़ाई सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं है, बल्कि यह तय करने की है कि सत्ता की कमान किसके हाथ में होगी। दिल्ली नियंत्रण चाहती है, योगी अपनी स्वायत्तता बनाए रखना चाहते हैं और आरएसएस सही वक्त का इंतजार कर रहा है। इन तीनों ध्रुवों के बीच फंसे विधायक और मंत्री अब अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं। यूपी की राजनीति अब महज चुनावी तैयारी नहीं रह गई है, बल्कि यह एक बड़े सत्ता पुनर्संतुलन की पटकथा बन चुकी है, जिसका अगला अध्याय आने वाले दिनों में और भी चौंकाने वाला हो सकता है।





