लोकसभा में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जुड़े यूजीसी विधेयक 2026 को लेकर समाजवादी पार्टी के सांसद ने सरकार पर निशाना साधा। सपा सांसद शिवपाल सिंह पटेल ने दावा किया कि यह विधेयक सिर्फ वोट हासिल करने के लिए लाया गया था और अब सरकार इसे आगे बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है।
अनुदान की अनुपूरक मांगों पर चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि सरकार इस बिल का अदालत में ठीक से बचाव भी नहीं कर पा रही है। उनके मुताबिक सरकार के वकील भी इस विधेयक के समर्थन में मजबूती से दलील नहीं दे पा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अब सरकार इस बिल को ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी कर रही है।
विश्वविद्यालयों में बढ़ रहा जातिगत भेदभाव: सपा सांसद
प्रतापगढ़ से सांसद शिवपाल सिंह पटेल ने कहा कि देश के कई विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव बढ़ गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों और परीक्षाओं के दौरान भी भेदभाव होता है।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आज के “द्रोणाचार्य” छात्रों से अंगूठा नहीं मांगते, बल्कि वाइवा में नंबर काट देते हैं या फाइल में लिख देते हैं कि ‘उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिला’।
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आईआईएम में प्रतिनिधित्व को लेकर उठाए सवाल
सपा सांसद ने यह भी दावा किया कि भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद, भारतीय प्रबंध संस्थान कोलकाता, भारतीय प्रबंध संस्थान इंदौर और भारतीय प्रबंध संस्थान शिलांग जैसे संस्थानों में ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के शिक्षकों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है।
आरक्षण के मुद्दे पर भी सरकार को घेरा
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री खुद पिछड़े वर्ग से होने की बात करते हैं, लेकिन सरकार की नीतियों में पिछड़ी जातियों के साथ भेदभाव दिखाई देता है। उन्होंने 2015 का जिक्र करते हुए कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण पर रोक लगाई थी, तब कई सालों तक आईआईएम और आईआईटी जैसे संस्थानों में ओबीसी छात्रों को प्रवेश नहीं मिल पाया था।
सपा सांसद के इस बयान के बाद उत्तर प्रदेश में यूजीसी विधेयक को लेकर राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है। वहीं इसे लेकर भारतीय जनता पार्टी पर भी राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है।



