उत्तर प्रदेश की सत्ता के गलियारों में इस वक्त सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा। लखनऊ के 5 कालिदास मार्ग यानी मुख्यमंत्री आवास के अंदर जिस तरह से लगातार बैठकों का दौर चल रहा है उसने सियासी हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर बार-बार RSS और बीजेपी संगठन को एक साथ बैठकर रणनीति बनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या सब कुछ वैसा ही है जैसा ऊपर से दिखाया जा रहा है या फिर अंदर ही अंदर कुछ बड़ा सियासी मंथन चल रहा है?
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दरअसल 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी ने अभी से अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है और इसी कड़ी में मुख्यमंत्री आवास पर बीजेपी कोर कमेटी की एक बेहद अहम बैठक हुई। इस बैठक को और ज्यादा खास इसलिए माना जा रहा है क्योंकि इसमें RSS के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार खुद मौजूद रहे। उनके साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और संगठन के कई बड़े चेहरे शामिल हुए। कहा जा रहा है कि इस बैठक का असली मकसद सिर्फ चुनावी तैयारी नहीं था बल्कि सरकार और संगठन के बीच चल रही खींचतान को खत्म करना भी था। क्योंकि पिछले कुछ समय से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज थी कि उत्तर प्रदेश में सरकार और संगठन के बीच तालमेल को लेकर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। सूत्र बताते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद पंकज चौधरी की सक्रियता काफी बढ़ी है और वह संगठन के साथ-साथ सरकार से जुड़े मामलों में भी गहरी दिलचस्पी लेते दिखाई दे रहे हैं। पंकज चौधरी को अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भरोसेमंद नेता माना जाता है और यही वजह है कि दिल्ली की रणनीति को प्रदेश में लागू करने की बड़ी जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर मानी जा रही है। यहीं से सियासी समीकरण थोड़ा पेचीदा होता दिखाई देता है क्योंकि चर्चा यह भी है कि दिल्ली से आने वाले कई निर्देश सीधे संगठन के माध्यम से लागू किए जा रहे हैं जिससे सरकार और संगठन की भूमिका को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। बताया जाता है कि योगी आदित्यनाथ पहले भी साफ कर चुके हैं कि संगठन अपनी जिम्मेदारी निभाए और सरकार अपनी, लेकिन जिस तरह संगठन की सक्रियता बढ़ रही है उसने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी है। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद का वह बयान भी एक बार फिर चर्चा में आ गया है जब केशव प्रसाद मौर्य ने कहा था कि संगठन सरकार से बड़ा होता है। अब जब पंकज चौधरी प्रदेश अध्यक्ष बने हैं तो कई लोग उसी बयान को मौजूदा हालात से जोड़कर देख रहे हैं। राजनीतिक सूत्रों की मानें तो 2027 चुनाव को लेकर टिकट वितरण और जातीय समीकरण की तैयारी भी अभी से शुरू हो चुकी है। कहा जा रहा है कि संगठन स्तर पर संभावित उम्मीदवारों को लेकर फीडबैक लिया जा रहा है और जमीनी कार्यकर्ताओं की रिपोर्ट के आधार पर रणनीति तैयार की जा रही है। यहीं पर एक और चर्चा सामने आती है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ द्वारा सुझाए गए कई नामों को अंतिम सूची में जगह नहीं मिली थी और बाद में चुनाव परिणाम को देखते हुए इस पर अंदरखाने काफी मंथन भी हुआ था। यही वजह मानी जा रही है कि अब योगी खेमे की ओर से यह राय भी सामने आ रही है कि टिकट वितरण में सरकार की राय को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए। इन तमाम चर्चाओं के बीच RSS की सक्रियता को भी काफी अहम माना जा रहा है। संघ से जुड़े सूत्रों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में अगर बीजेपी का सबसे मजबूत चेहरा कोई है तो वह योगी आदित्यनाथ ही हैं और इसलिए उनके नेतृत्व को लेकर किसी तरह का भ्रम नहीं रहना चाहिए। यही कारण है कि संघ लगातार सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय बनाने की कोशिश में लगा हुआ है।

मुख्यमंत्री आवास पर हुई बैठक में सिर्फ मतभेद ही नहीं बल्कि आगे की रणनीति पर भी विस्तार से चर्चा हुई। मंत्रिमंडल विस्तार की संभावनाओं से लेकर यूपी बीजेपी की नई टीम तक कई मुद्दों पर विचार हुआ। साथ ही इस बात पर भी जोर दिया गया कि अगर कहीं कार्यकर्ताओं में नाराजगी है तो उसे जल्द दूर किया जाए क्योंकि चुनाव में सबसे बड़ी ताकत जमीनी कार्यकर्ता ही होते हैं। बैठक में यह भी तय हुआ कि योगी सरकार की उपलब्धियों को ज्यादा आक्रामक तरीके से जनता तक पहुंचाया जाएगा और पिछली सरकारों से तुलना करते हुए एक बड़ा राजनीतिक अभियान भी चलाया जा सकता है। यानी साफ है कि बीजेपी अब 2027 की लड़ाई को सिर्फ चुनाव नहीं बल्कि एक नैरेटिव की लड़ाई के रूप में भी देख रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि बैठक के जरिए एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की गई। नेताओं ने यह माना कि अगर पार्टी को 2027 में फिर से बड़ी जीत हासिल करनी है तो सरकार और संगठन को एक सुर में काम करना होगा और किसी भी तरह की अंदरूनी नाराजगी को सार्वजनिक होने से पहले ही खत्म करना होगा। फिलहाल बीजेपी की ओर से यही संदेश दिया जा रहा है कि सब कुछ सामान्य है और पार्टी पूरी तरह एकजुट है, लेकिन जिस तरह से लगातार उच्चस्तरीय बैठकों का दौर चल रहा है वह यह जरूर संकेत देता है कि 2027 की लड़ाई को लेकर पार्टी कोई भी जोखिम नहीं लेना चाहती। अब सबसे दिलचस्प सवाल यही है कि क्या इन बैठकों के बाद पूरी तरह तालमेल बन पाएगा या फिर यह सियासी हलचल आगे और बड़े बदलाव का संकेत है। क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह बात हमेशा कही जाती है कि जब दिल्ली की रणनीति और लखनऊ का नेतृत्व एक दिशा में चलता है तो बीजेपी अजेय दिखाई देती है, लेकिन अगर दोनों के बीच जरा सी भी दूरी आती है तो विपक्ष को मौका मिल जाता है। शायद यही वजह है कि RSS खुद इस पूरी प्रक्रिया में संतुलन बनाने की भूमिका निभाता दिखाई दे रहा है ताकि 2027 से पहले कोई भी सियासी संदेश गलत न जाए। फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है लेकिन इतना जरूर तय है कि उत्तर प्रदेश में सियासत का तापमान बढ़ चुका है और आने वाले महीनों में बीजेपी के अंदर होने वाले फैसले ही तय करेंगे कि 2027 की लड़ाई में पार्टी किस रणनीति और किस चेहरे के साथ मैदान में उतरेगी। और यही वह सियासी सस्पेंस है जिस पर पूरे देश की नजर टिकी हुई है।






