जो लोग बीजेपी को वोट देकर अपने सुरक्षित और खुशहाल भविष्य का सपना देख रहे थे, आज उन्हीं के घरों से आंसुओं की धारा थमने का नाम नहीं ले रही। जिन हाथों से कभी अपने कारोबार को खड़ा किया था, आज वही हाथ अपने ही आशियाने पर हथौड़ा चलाने को मजबूर हैं। हर चोट के साथ सिर्फ दीवारें नहीं गिर रहीं, बल्कि सालों की मेहनत, उम्मीदें और सपने भी बिखरते जा रहे हैं। रोते-बिलखते बच्चों की चीखें, बेबस महिलाओं की सिसकियां और खामोश खड़े बुजुर्ग—यह मंजर किसी के भी दिल को चीर देने के लिए काफी है।
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मेरठ के मशहूर सेंट्रल मार्केट में इन दिनों यही दर्दनाक तस्वीर देखने को मिल रही है। हजारों की संख्या में व्यापारी अपने व्यावसायिक भवनों को टूटते हुए देख रहे हैं। हालांकि इस पूरे मामले की जड़ सुप्रीम कोर्ट का आदेश है, जिसमें आवासीय भूखंडों पर अवैध रूप से चल रहे स्कूल, अस्पताल और बैंकों को तुरंत बंद करने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट के इसी सख्त रुख के बाद प्रशासन ने कार्रवाई तेज की और अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलना शुरू हो गया। इस कार्रवाई की चपेट में हर वह व्यक्ति आ रहा है जो नियमों के दायरे से बाहर पाया गया, चाहे वह किसी भी वर्ग या समुदाय का हो। इस कार्रवाई से व्यापारियों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। कई घरों में चूल्हे ठंडे पड़ गए हैं और परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी भी मुश्किल हो गई है। व्यापारी और उनके परिजन अब शासन-प्रशासन और न्यायालय से राहत की गुहार लगा रहे हैं, साथ ही पुनर्वास की मांग भी जोर पकड़ती जा रही है।






