पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के रुझानों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की मजबूत स्थिति के पीछे जहां कई राजनीतिक और सामाजिक कारक जिम्मेदार माने जा रहे हैं, वहीं संगठनात्मक स्तर पर एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है, सुनील बंसल। बंगाल के संगठन प्रभारी के रूप में बंसल की रणनीति और कार्यशैली को इस बढ़त का प्रमुख आधार माना जा रहा है।
‘रणनीति के जादूगर’ क्यों कहलाते हैं बंसल?
सुनील बंसल को पार्टी के भीतर एक ऐसे रणनीतिकार के रूप में देखा जाता है, जो बिना ज्यादा शोर-शराबे के बड़े चुनावी परिणाम देने की क्षमता रखते हैं।उन्हें अक्सर राजनीति का “जादूगर” कहा जाता है, क्योंकि जिस राज्य में वे संगठन की जिम्मेदारी संभालते हैं, वहां पार्टी का प्रदर्शन उल्लेखनीय रूप से बेहतर होता है।
अमित शाह के करीबी और भरोसेमंद।
अमित शाह के करीबी माने जाने वाले बंसल पार्टी के अंदर बेहद भरोसेमंद रणनीतिकार हैं। कहा जाता है कि कई अहम फैसले वे अमित शाह के मार्गदर्शन और संकेत पर लेते हैं, जिससे उनकी रणनीति पार्टी की केंद्रीय सोच के अनुरूप रहती है।
बंगाल में महीनों तक जमीनी मेहनत
पश्चिम बंगाल में बंसल ने केवल चुनावी समय में नहीं, बल्कि महीनों पहले से ही काम शुरू कर दिया था, उन्होंने राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद किया, संगठन की कमियों को समझा और उसे मजबूत किया। उनकी खासियत यह मानी जाती है कि वे क्षेत्रवार कार्यकर्ताओं के नाम तक याद रखते हैं, जिससे जमीनी स्तर पर एक मजबूत जुड़ाव बनता है।
टिकट वितरण से लेकर बूथ मैनेजमेंट तक
सुनील बंसल की भूमिका सिर्फ रणनीति बनाने तक सीमित नहीं रही। उम्मीदवारों के चयन (टिकट वितरण) में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही बूथ स्तर पर संगठन को सक्रिय और प्रभावी बनाया। रैली, प्रचार और मैनेजमेंट की हर छोटी-बड़ी व्यवस्था पर बारीकी से नजर रखी
यही वजह है कि पार्टी का चुनावी ढांचा बेहद संगठित और मजबूत नजर आया।
बिना प्रचार के काम करने की शैली।
बंसल उन नेताओं में से हैं जो मीडिया से दूरी बनाकर काम करना पसंद करते हैं। वे न तो इंटरव्यू देते हैं और न ही खुद को प्रचार में आगे रखते हैं, बल्कि पूरी तरह संगठन को मजबूत करने पर ध्यान देते हैं। उनकी यही “लो-प्रोफाइल, हाई-इम्पैक्ट” शैली उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती है।
उत्तर प्रदेश का अनुभव बना आधार
सुनील बंसल 2014 से 2022 तक उत्तर प्रदेश में भाजपा के संगठन महामंत्री रहे।
इस दौरान Uttar Pradesh में भाजपा ने बड़ी जिसमें उनकी भूमिका बेहद अहम मानी गई। 2022 के विधानसभा चुनाव में एंटी-इंकंबेंसी के बावजूद पार्टी की वापसी भी उनकी रणनीति की सफलता का उदाहरण है। बंगाल में उसी मॉडल की पुनरावृत्ति बंगाल में बंसल ने यूपी मॉडल को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ढालकर लागू किया।
उन्होंने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया, कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरी और चुनावी मशीनरी को पूरी तरह सक्रिय रखा। यह कहना गलत नहीं होगा कि उनकी रणनीति ने बीजेपी को बंगाल में एक मजबूत चुनौती पेश करने लायक बनाया।
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में भाजपा की बढ़त केवल राजनीतिक लहर का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुविचारित और गहराई से लागू की गई संगठनात्मक रणनीति का नतीजा भी है। Sunil Bansal ने जिस तरह बिना शोर किए, जमीनी स्तर पर काम करते हुए पार्टी को मजबूती दी, वह उनकी कार्यशैली और राजनीतिक समझ का प्रमाण है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बंसल का यह “संगठन मॉडल” अन्य राज्यों में भी उसी तरह सफलता दिला पाता है, जैसा कि उत्तर प्रदेश और अब पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है।






