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बंगाल में ‘बुलडोजर मॉडल’ की अग्निपरीक्षा, क्या योगी का दांव बदलेगा सियासी समीकरण?

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पश्चिम बंगाल की राजनीति आज एक अहम मोड़ पर खड़ी है, जहां चुनावी नतीजे यह तय करेंगे कि राज्य की सत्ता की बागडोर किसके हाथ में जाएगी। मतगणना के बीच शुरुआती रुझानों ने सियासी माहौल को और भी दिलचस्प बना दिया है। खास बात यह है कि इस बार चुनावी मैदान में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘बुलडोजर मॉडल’ की भी अप्रत्यक्ष परीक्षा मानी जा रही है, जिसने इस चुनाव को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है।

चुनाव प्रचार के दौरान योगी आदित्यनाथ ने कल्याणी, बांकुड़ा और पुरुलिया सहित 20 से अधिक जनसभाएं और रोड शो किए। उनके आक्रामक प्रचार अभियान ने न सिर्फ पश्चिम बंगाल में, बल्कि उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी राजनीतिक रुचि बढ़ा दी। ‘डबल इंजन सरकार’ और सख्त कानून-व्यवस्था के उनके दावों को लेकर अब जनता का फैसला सामने आने लगा है।

भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जारी शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। भारतीय जनता पार्टी लगभग 83 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है, जबकि तृणमूल कांग्रेस करीब 44 सीटों पर आगे चल रही है। इसके अलावा अन्य दल और निर्दलीय उम्मीदवार भी कुछ सीटों पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं, जिससे मुकाबला और भी रोचक हो गया है।

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सबसे दिलचस्प मुकाबलों में से एक भवानीपुर सीट पर देखने को मिल रहा है, जहां भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। इस सीट पर मुकाबला प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है, क्योंकि यह राज्य की सियासत का केंद्र बिंदु मानी जाती है।

इस चुनाव के नतीजे केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका असर आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी पड़ सकता है। वर्ष 2027 में यूपी विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में भाजपा के लिए यह नतीजे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। अगर बंगाल में पार्टी मजबूत प्रदर्शन करती है, तो इससे यूपी में भी उसका मनोबल बढ़ सकता है।

वहीं, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के लिए यह चुनाव अपनी साख बचाने की चुनौती बन गया है। अगर रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल के ये चुनाव परिणाम केवल एक राज्य की सत्ता का फैसला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के भविष्य की दिशा भी तय कर सकते हैं। अब सभी की निगाहें अंतिम नतीजों पर टिकी हैं, जो यह स्पष्ट करेंगे कि क्या ‘बुलडोजर मॉडल’ और ‘डबल इंजन’ का नारा जनता को प्रभावित कर पाया या नहीं।

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