भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। 26 मई भारतीय राजनीति और लोकतंत्र के इतिहास का वह भावुक दिन माना जाता है, जब देश ने एक ऐसे नेता को खो दिया जिसने आधुनिक भारत की नींव रखी।पंडित नेहरू केवल राजनेता नहीं थे, बल्कि वे स्वतंत्र भारत के सपनों, विकास और लोकतांत्रिक सोच के प्रतीक थे। उनका अंतिम दिन आज भी करोड़ों भारतीयों की स्मृतियों में भावुकता के साथ याद किया जाता है।
देश निर्माण में निभाई ऐतिहासिक भूमिका

स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आजाद भारत के निर्माण तक नेहरू की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। उन्होंने वैज्ञानिक सोच, लोकतंत्र, शिक्षा और औद्योगिक विकास को देश की प्रगति का आधार बनाया।उनके नेतृत्व में भारत ने कई बड़े संस्थानों की स्थापना की, जिनमें आईआईटी, बड़े बांध, वैज्ञानिक संस्थान और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग शामिल हैं। नेहरू का मानना था कि मजबूत लोकतंत्र ही भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है।
अंतिम दिनों में बिगड़ने लगी थी तबीयत

1964 में पंडित नेहरू की तबीयत लगातार खराब रहने लगी थी। अत्यधिक कार्यभार और बढ़ती उम्र का असर उनके स्वास्थ्य पर साफ दिखाई देने लगा था। इसके बावजूद वे लगातार देश के कार्यों में सक्रिय रहे।26 मई 1964 का दिन भारतीय इतिहास में बेहद भावुक माना जाता है। देशभर में लोग उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थे। अगले दिन 27 मई 1964 को उनके निधन की खबर ने पूरे देश को गहरे शोक में डुबो दिया।
पूरे देश में छा गया था मातम

नेहरू के निधन की खबर सुनते ही देशभर में शोक की लहर दौड़ गई। लाखों लोग अपने प्रिय नेता को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़े। भारत ने उस दिन केवल एक प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी नेता और आधुनिक भारत के निर्माता को खो दिया था।उनकी अंतिम यात्रा में जनसैलाब उमड़ पड़ा था। आम नागरिकों से लेकर बड़े नेताओं तक हर किसी की आंखें नम थीं।
बच्चों के “चाचा नेहरू” थे पंडित नेहरू

जवाहरलाल नेहरू बच्चों से बेहद प्रेम करते थे। यही कारण था कि बच्चे उन्हें प्यार से “चाचा नेहरू” कहते थे। उनका मानना था कि देश का भविष्य बच्चों के हाथों में है और शिक्षा ही भारत को मजबूत बनाएगी।आज भी 14 नवंबर को उनका जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
आज भी जीवित है नेहरू की विरासत

आजादी के बाद भारत को लोकतांत्रिक और आधुनिक राष्ट्र बनाने में नेहरू की सोच और नीतियों का बड़ा योगदान माना जाता है। उनकी विरासत आज भी भारतीय राजनीति, शिक्षा और विकास मॉडल में दिखाई देती है।26 मई केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उस युग के अंत का प्रतीक है जिसने भारत को आधुनिकता, लोकतंत्र और विकास की नई दिशा दी।






