क्या योगी आदित्यनाथ की ताकत अब इतनी बढ़ चुकी है कि कभी उनके सबसे बड़े सियासी विरोधी रहे नेता भी उनके दरबार तक पहुंचने लगे हैं? क्या गोरखपुर की राजनीति में दशकों पुरानी दुश्मनी अब दोस्ती में बदलने जा रही है? और क्या 2027 के महासंग्राम से पहले बीजेपी के भीतर एक ऐसा समीकरण बन रहा है, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी? जी हां, एक तस्वीर ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। कभी एक-दूसरे को देखना तक पसंद न करने वाले योगी आदित्यनाथ और शिव प्रताप शुक्ला की मुलाकात ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है।
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सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह तस्वीर खुद तेलंगाना के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला ने साझा की, जिसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या कभी योगी के सबसे बड़े सियासी प्रतिद्वंद्वी रहे शिव प्रताप शुक्ला अब उनके साथ कंधे से कंधा मिलाने को तैयार हैं, या फिर इस तस्वीर के पीछे छिपा है 2027 का कोई बड़ा राजनीतिक संदेश? दरअसल, लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और तेलंगाना के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला की मुलाकात हुई। मुलाकात की तस्वीर सामने आते ही राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गईं, क्योंकि दोनों नेताओं के बीच की सियासी खटास किसी से छिपी नहीं रही है। कहा जाता है कि साल 2002 में गोरखपुर विधानसभा चुनाव के दौरान दोनों नेताओं के रिश्तों में दरार पड़ गई थी। उस समय युवा सांसद योगी आदित्यनाथ अपने करीबी डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल को गोरखपुर सीट से चुनाव लड़ाना चाहते थे, लेकिन बीजेपी नेतृत्व ने तत्कालीन वरिष्ठ नेता शिव प्रताप शुक्ला को उम्मीदवार बना दिया। इसके बाद हालात ऐसे बने कि डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे और शिव प्रताप शुक्ला तीसरे स्थान पर खिसक गए। तभी से दोनों नेताओं के बीच दूरी और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की चर्चा होती रही। जब शिव प्रताप शुक्ला को तेलंगाना का राज्यपाल बनाया गया, तब भी राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें लगाई गई थीं। पूर्वांचल में पंडित हरिशंकर तिवारी के बाद शिव प्रताप शुक्ला को एक बड़े ब्राह्मण चेहरे के तौर पर देखा जाता रहा है। ऐसे में वर्षों बाद दोनों नेताओं की यह मुलाकात कई राजनीतिक संकेत दे रही है। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि जहां शिव प्रताप शुक्ला ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से योगी आदित्यनाथ के साथ तस्वीर साझा की, वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से इस तस्वीर को पोस्ट नहीं किया गया। इसके बाद राजनीतिक जानकार अपने-अपने हिसाब से इसके मायने निकाल रहे हैं। कोई इसे बीजेपी के भीतर एकता का संदेश बता रहा है तो कोई इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पूर्वांचल और ब्राह्मण समीकरण को साधने की बड़ी रणनीति मान रहा है।हालांकि, यह मुलाकात महज शिष्टाचार थी या आने वाले समय में कोई नया राजनीतिक अध्याय लिखने वाली है, इसका जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है। लेकिन इतना जरूर है कि एक तस्वीर ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या दशकों पुरानी सियासी दुश्मनी अब नई दोस्ती में बदलने जा रही है, या फिर यह सिर्फ राजनीति की मुस्कुराहट है, जिसके पीछे कई अनकही कहानियां छिपी हुई हैं।






