Home National लिव-इन रिलेशनशिप पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, उत्पीड़न के मामलों में...

लिव-इन रिलेशनशिप पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, उत्पीड़न के मामलों में मिलेगी कानूनी सुरक्षा

36
0

नई दिल्ली: लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोगों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले किसी व्यक्ति को उसके साथी या साथी के परिजनों द्वारा मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, तो उसे भी वैसी ही कानूनी सुरक्षा मिल सकती है जैसी विवाहिता महिलाओं को मिलती है। न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत उपलब्ध संरक्षण केवल वैवाहिक संबंधों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि बदलते सामाजिक परिवेश को ध्यान में रखते हुए लिव-इन संबंधों में रहने वाले लोगों पर भी लागू किया जा सकता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कानून का उद्देश्य केवल पारंपरिक विवाह संस्था की रक्षा करना नहीं, बल्कि किसी भी व्यक्ति को घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना और क्रूरता से सुरक्षा प्रदान करना भी है। अदालत ने माना कि समाज में रिश्तों की प्रकृति बदल रही है और कानून को भी इन परिवर्तनों के अनुरूप विकसित होना चाहिए।

क्या है धारा 498A?

भारतीय दंड संहिता की धारा 498A पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा पत्नी के साथ क्रूरता, उत्पीड़न या दहेज की मांग के लिए प्रताड़ना जैसे मामलों से संबंधित है। इस प्रावधान के तहत दोषी पाए जाने पर आरोपी को तीन वर्ष तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।

कानून के अनुसार, यदि किसी महिला को इस प्रकार प्रताड़ित किया जाए कि वह आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए या उसे गंभीर मानसिक अथवा शारीरिक नुकसान पहुंचे, अथवा दहेज या संपत्ति जैसी अवैध मांगों के लिए परेशान किया जाए, तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है।

लिव-इन पार्टनर्स को भी मिलेगा संरक्षण

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोगों को भी समान परिस्थितियों में कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के अधिकार केवल इस आधार पर सीमित नहीं किए जा सकते कि वह वैवाहिक संबंध में नहीं है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि लिव-इन संबंध विभिन्न परिस्थितियों और स्वरूपों में हो सकते हैं। इसलिए कानून की व्याख्या करते समय सामाजिक वास्तविकताओं और व्यक्तिगत अधिकारों को भी महत्व दिया जाना चाहिए।

बदलते सामाजिक परिवेश पर कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समाज में पारिवारिक और व्यक्तिगत संबंधों की संरचना समय के साथ बदल रही है। ऐसे में न्याय व्यवस्था का दायित्व है कि वह कानून की ऐसी व्याख्या करे जिससे सभी नागरिकों को समान न्याय और सुरक्षा मिल सके। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी प्रकार की घरेलू क्रूरता या उत्पीड़न को केवल विवाह के दायरे तक सीमित नहीं माना जा सकता।

इस फैसले को लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोगों के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, प्रत्येक मामले में अदालत उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर ही अंतिम निर्णय देगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here