लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। दोनों दल सार्वजनिक तौर पर साथ चुनाव लड़ने की बात कह रहे हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर नेताओं के बयानों ने गठबंधन के भीतर बढ़ते दबाव को सामने ला दिया है। कांग्रेस की ओर से करीब 150 से 200 सीटों तक दावेदारी की चर्चा है, जबकि सपा की तरफ से सीटों की संख्या से ज्यादा जीत की संभावना यानी ‘विनेबिलिटी’ को आधार बनाने की बात कही जा रही है।इसी बीच कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और सहारनपुर सांसद इमरान मसूद ने सीट शेयरिंग को जल्द अंतिम रूप देने की मांग उठाई। मसूद ने कहा कि गठबंधन में दोनों दलों के सम्मान का ध्यान रखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि कांग्रेस अब 2017 वाली कांग्रेस नहीं है, बल्कि 2027 के चुनाव के लिए पार्टी नए तेवर और नई तैयारी के साथ मैदान में है।
‘सीट होगी तभी जीतेंगे’… इमरान मसूद का सपा को संदेश
इमरान मसूद ने सीट शेयरिंग को लेकर साफ कहा कि अगर गठबंधन को आगे बढ़ाना है तो सीटों का फैसला समय रहते होना चाहिए। उन्होंने कांग्रेस के सम्मानजनक हिस्से की मांग करते हुए कहा कि दोनों पार्टियों को एक-दूसरे के सम्मान का ख्याल रखना होगा।मसूद ने यह भी कहा कि कांग्रेस के पास जीतने वाले उम्मीदवार हैं, लेकिन कोई भी प्रत्याशी जीत का प्रमाणपत्र लेकर नहीं आता। उनके मुताबिक जीत का अंतिम फैसला चुनाव के नतीजे ही करते हैं। सीटों की संख्या को लेकर उन्होंने 150 से 200 तक की संभावित दावेदारी की बात कही और अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व पर छोड़ दिया।कांग्रेस की ओर से सीटों की संख्या को लेकर अलग-अलग नेताओं के बयान सामने आए हैं। यूपी कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने भी बराबर हिस्सेदारी और सम्मान की बात कही है, हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतिम संख्या वरिष्ठ नेतृत्व की बातचीत से ही तय होगी।
रामगोपाल यादव का पलटवार, ‘अंतिम फैसला शीर्ष नेतृत्व करेगा’
कांग्रेस नेताओं की बयानबाजी के बीच सपा के वरिष्ठ नेता प्रो. रामगोपाल यादव की प्रतिक्रिया ने विवाद को और हवा दे दी। सपा की ओर से लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि सीट बंटवारे का अंतिम फैसला प्रदेश स्तर के नेताओं के बयानों से नहीं, बल्कि दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की बातचीत से होगा।
सपा खेमे की ओर से कांग्रेस की जमीनी स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालिया बयानों में सपा नेताओं ने कांग्रेस से यह स्पष्ट करने को कहा है कि वह जिन सीटों पर दावा कर रही है, वहां उसके पास कितने मजबूत उम्मीदवार हैं।यानी एक तरफ कांग्रेस ज्यादा सीटों के जरिए अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश में दिखाई दे रही है, तो दूसरी तरफ सपा सीटों की संख्या के बजाय जीत की क्षमता को आधार बनाने पर जोर दे रही है।
अखिलेश का ‘सीट नहीं, जीत’ वाला फॉर्मूला
इस पूरे विवाद के बीच अखिलेश यादव का रुख भी अहम है। अखिलेश ने कहा है कि गठबंधन में कितनी सीटें किस दल को मिलेंगी, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि दोनों दल मिलकर चुनाव जीतने की रणनीति बनाएं। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस ने 150 सीटों की कोई औपचारिक मांग नहीं रखी है और सीटों पर अंतिम फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की बातचीत से होगा।यूपी विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। ऐसे में अगर कांग्रेस 150 से 200 सीटों के बीच हिस्सेदारी की मांग करती है तो सपा के लिए अपने संगठन और संभावित दूसरे सहयोगियों के बीच सीटों का संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होगा।
2027 से पहले सबसे बड़ा सवाल- कितनी सीटों पर बनेगी बात?
फिलहाल दोनों दलों के बीच गठबंधन टूटने का कोई औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है। बल्कि दोनों पक्ष गठबंधन को आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं। लेकिन जिस तरह सीटों को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी तेज हुई है, उसने बातचीत की दिशा पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।कांग्रेस ज्यादा सीटों के जरिए अपना राजनीतिक आधार और सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहती है, जबकि सपा यूपी में अपने संगठनात्मक प्रभाव और जीत की संभावना को आधार बनाकर सीटों का बंटवारा चाहती है।अब असली नजर इस बात पर है कि राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच होने वाली बातचीत में 403 सीटों का क्या फॉर्मूला निकलता है। क्या कांग्रेस की 150-200 सीटों की दावेदारी बातचीत की शुरुआती रणनीति है या अंतिम मांग? और क्या सपा ‘विनेबिलिटी’ के फॉर्मूले से कांग्रेस की सीटों की संख्या सीमित करने की कोशिश करेगी? इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में होने वाली सीट शेयरिंग वार्ता से ही सामने आएगा।
