गोरखपुर में अगर किसी ने योगी आदित्यनाथ को ललकारा है वो था हाता वाले बाहुबली हरी शंकर तिवारी आज जब योगी आदित्यनाथ पूर्वांचल में माफिया के साम्राज्य को एक-एक कर गिरा रहे हैं, तब एक नाम बार-बार इतिहास के अंधेरे गलियारों से निकलकर सामने आता है हरी शंकर तिवारी।
गोरखपुर से लखनऊ तक कभी जिनका “सिक्का चलता था”, वह व्यक्ति नहीं एक चलता-फिरता सत्ता तंत्र था।जब उनका काफिला सड़क पर उतरता था, तो बड़े-बड़े अफसरों की रीढ़ सीधी हो जाया करती थी।उस दौर में कानून किताबों में रहता था, और ज़मीन पर हुक्म हाता वाले बाहुबली का चलता था।
चिल्लूपार सीट से 1985 में जेल के अंदर से विधायक बनना सिर्फ चुनावी जीत नहीं थी वह भारतीय राजनीति के लिए क्राइम को वैधता देने का पहला खुला सर्टिफिकेट था।यहीं से संदेश गया अगर बाहुबल है, तो लोकतंत्र तुम्हारे सामने झुक सकता है।
इसके बाद 22 साल तक सत्ता में बने रहना,और 1997 से 2007 तक हर सरकार में मंत्री बने रहना यह बताता है कि वह व्यक्ति नहीं, बल्कि राज्य के भीतर समानांतर राज्य बन चुके थे।भाजपा, सपा या बसपा सरकार बदलती रही, लेकिन तिवारी सत्ता का हिस्सा बने रहे।मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, धनंजय सिंह, रमाकांत–उमाकांत यादव ये नाम अचानक नहीं आए।
ये उसी “तिवारी मॉडल ऑफ पावर” की राजनीतिक संताने थे।यह वही मॉडल था जिसमें अपराध टिकट दिलवाता था गोली प्रचार करती थी और सत्ता संरक्षण देती थीऔर पूर्वांचल पूरे उत्तर प्रदेश का सबसे खतरनाक प्रयोगशाला क्षेत्र बना दिया गया। आज योगी उस युग के कफन पर अंतिम कील ठोक रहे हैं।
और यही वजह है कि पूर्वांचल की राजनीति में सबसे ज्यादा नफरत भी योगी के हिस्से आती है क्योंकि उन्होंने सत्ता से अपराध को बेदखल कर दिया।





