पूर्वांचल की राजनीति में कुछ ठिकाने सत्ता के नहीं,शक्ति के प्रतीक हुआ करते थे। ऐसी ही एक जगह थी शक्ति सदनजहाँ से ठाकुर राजनीति की धड़कन चलती थी।और उस धड़कन का नाम था वीरेंद्र प्रताप शाही।वह सिर्फ एक नेता नहीं थे,वह राजपूत वर्चस्व की दीवार थे। जब ठाकुर समाज का मोर्चा संभालने की बात आती थी,तो पूर्वांचल की निगाहें एक ही नाम पर टिकती थीं वीरेंद्र प्रताप शाही। 28 अगस्त 1978 पूर्वांचल के राजनीतिक इतिहास की वह तारीख जिसने बाहुबल की दिशा ही बदल दी। जब गगाहा क्षेत्र में शाही के करीबी साथी बेचई पांडे की हत्या की खबर आई, तो पूरा इलाका उबल पड़ा।
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बताया जाता है कि जब बेचई पांडे की लाश लेकर शाही के लोग लौट रहे थे तभी रास्ते में हरी शंकर तिवारी के तीन करीबी साथी रंग नारायण पांडेय सहित तिवारीपुर के लड़को को वीरेंद्र शाही के आदमियों ने मार डाला इसके बाद शाही के दो–तीन और करीबी साथियों की हत्या हुई
और फिर शाही बनाम तिवारी की लड़ाई पूर्वांचल की राजनीति का स्थायी युद्ध बन गई। 80 के दशक में आते-आते सरकारी ठेकों और सत्ता की पहुंच को लेकर दोनों के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया।इसी संघर्ष के बीचवीरेंद्र प्रताप शाही नेमहाराजगंज जिले की लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरने का फैसला किया।उनके सामने थे अमरमणि त्रिपाठी,जो कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थेऔर हरी शंकर तिवारी के सबसे करीबी माने जाते थे।परिणाम आया…और शाही नेअमरमणि त्रिपाठी कोलगभग 5,000 वोटों से पराजित कर दिया।
उस चुनाव में वीरेंद्र प्रताप शाही का चुनाव चिन्ह था शेरऔर यहीं से उन्हें मिलावह नाम, जो आज भी पूर्वांचल में गूंजता है शेरे-पूर्वांचल





